सोंकस
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सोंकस एस्पर
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सोंकस एक जंगली पौधा है जो शाक के रूप में पाया जाता है। एक वर्ष की अवधि तक चलने वाला पौधा सोंकस है जिसके पत्ते कांटेदार होते हैं, पीले फूल आते हैं। फूल बीज में बदलते हैं तो हवा में उड़ते रहते हैं। डेंडलियन फूल जैसे मिलते जुलते फूल हैं।इसके पूरे शरीर से दूधिया रस बाहर निकलता है जब इसे काटा जाता है तो। यह यूरोप उत्तरी अमेरिका, पश्चिम एशिया में पर्याप्त मात्रा में मिलता है। यह एक खरपतवार के रूप में जाना जाता है। इसके पत्ते खाए जाते हैं, सलाद के रूप में उपयोग में लाया जाता है। सोंकस के पत्ते और तना कच्चे या पका कर कुछ जगह खाते हैं, सलाद के रूप में भी पालक की भांति प्रयोग किए जाते हैं। इसका रस खाने से पहले धो दिया जाता है वरना कड़वाहट पैदा होता है। इसको जले हुए को ठीक करने के लिए भी काम में लेते हैं।
इस पौधे को स्पिनी थिसल नाम से जाना जाता है। इस पौधे को कुछ जगह दूधी नाम से जाना जाता है। पानी और हवा द्वारा इसके बीज उड़ कर दूर चले जाते हैं। सर्दियों में यह हरियाणा विशेषक दक्षिणी हरियाणा में अधिक मिलता है। यह फसल में खरपतवार का काम करता है तथा इधर उधर खड़ा देखा जा सकता है।
**होशियार सिंह, लेखक, कनीना, हरियाणा**
जंगली कुल्थी
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टेफ्रोशिया परपुरी
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दक्षिण हरियाणा में पुराने पड़े खेतों में स्वयं उगने वाला पौधा जंगली कुल्थी मिलता है जिसे ग्रामीण क्षेत्रों में झोझरू नाम से जाना जाता है। यह मटर परिवार से संबंध रखता है और इस पर भारी मात्रा में रंगीन फूल तथा फलियां आती है। इसके लाल, पीले, गुलाबी आदि रंगों में मिलते हैं, बंजर पड़ी हुई भूमि पर अपने आप उगाता है और पूरे ही भारत में यह पाया जाता है।
वैज्ञानिक भाषा में इसे टेफ्रोशिया परपुरी पुर पुरी नाम से जाना जाता है तथा ग्रामीण क्षेत्रों में पशुओं के चारे के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। कभी किसान ऊंट पालते थे। ऊंटों के लिए प्रमुख रूप से चारे के रूप में प्रयोग किया जाता है। इन पौधों के उगने से सबसे बड़ा लाभ है खेत में नाइट्रोजन खाद की पूर्ति भी हो जाती है।
इसके जड़, तना, पत्ती आदि गुणकारी एवं महत्वपूर्ण माने जाते हैं। जहां इसके बीज पेट के कीड़ों को समाप्त करने के लिए काम में लाए जाते है वहीं इसकी जड़ दातुन करने के लिए बुजुर्ग प्रयोग करते रहे हैं। ये जड़े पौष्टिक मानी जाती है। यह कई रोगों में काम आता है। इस पौधे की सबसे बड़ी विशेषता है कि जिसकी जड़ पौष्टिक मानी जाती है जो जरूर मछलियां के लिए जहर का कार्य करती हैं क्योंकि इसके पत्ते और बीजों में टेफ्रोसीन जहर विषैला होता है। यह पौधा स्तनधारी और सरीसर्प आदि के लिए कोई घातक प्रभाव नहीं डालता।
यह कई दवाओं में काम आता है। आयुर्वेद के अनुसार शरीर के कीड़ों से, जहरीले कीटो के काटने से बचाव में तथा बुखार को दूर करने के काम में लाया जाता है। जब कभी किसी व्यक्ति में कोढ़, दमा, फोड़ा फुंसी का रोग हो जाता है वही हृदय,पेट के विकार,सप्लीन और लीवर में कोई खराबी आने पर इसका उपयोग किया जाता है। जिसकी जड़ हृदय दर्द, जी मचलाने आदि काम में लाया जाता है माना जाता है दांतो के दर्द तथा दांतों में गिरने वाला रोग भी रोका जा सकता है । कई प्रकार के कास्मेटिक बनाने में इसके पत्ते भी पशुओं के चारे रूप में काम आते हैं।
क्योंकि यह बकरी तथा पशुओं के लिए बेहतर पत्तों वाला भोजन साबित होता है। यह हरा खाद बनाने के काम आता है क्योंकि इसमें फलियां पाई जाती है जिनकी जड़ों में सूक्ष्म जीव निवास करते जो वायुमंडल की नाइट्रोजन की खाद में बदलते हैं। यह पौधा सूख जाते हैं तो धरती में खाद की पूर्ति हो जाती है। यही कारण है की झोझरू किसानों के लिए वरदान माना जाता है
जब कभी पुराने समय में गोबर के उपले बनाए जाते थे जिसके लिए पतवार इसी से बनता था। यह पौधा झाड़ू बनाने की भी काम में लेते हैं जहां झाड़ू नहीं होती इसका उपयोग किया जाता है। झाड़ी के रूप में यह पौधा मिलता है और कई वर्षों तक धर


ती पर जीवित रहता है। इस पौधे की सबसे बड़ी विशेषता है कि यह धरती पर फैल जाता है तथा खाद की पूर्ति करता है। यह पौधा जंगली जीवों के लिए भी आहार का काम करता है तथा छोटे-छोटे जीवधारी इसी में छुप जाते हैं।
**होशियार सिंह पत्रकार लेखक कनीना हरियाणा**
झोझरू
(टेफरोसिया पुरपुरिया)
बंजर भूमि कभी भरी होती थी
शरपुंखा(झोझरू)हरी झाड़ी से
ऊंट बड़ चाव से खाता है इसे
उत्साह भरकर जुड़ता गाड़ी से,
जहां पानी की कमी मिलती है
झोझरू आज भी मिल जाता है
भूल गया है इस जड़ी बूटी को
दांत दर्द दूर करने काम आता है,
पुराने वक्त से जन प्रयोग करता
जड़ की बढिय़ा दातुन बनाने को
काट पीट किसान घर लाता था
ऊंट को बेहतर चारा खिलाने को,
शिकारी इसका प्रयोग करते आए
मछली मारने का जहर बनाने को
तालाब, तालाबों से मारकर लाता
होला बनाकर मछली का खाने को,
कीट भी इससे दूर भागते हैं सभी
राजस्थान में मासा नाम से जानते हैं
त्वचा रोग, कोढ़, लिवर, हृदय रोग
खून के रोग, बवासीर में पहचानते हैं,
भूख बढ़ाता, गनोरिया रोग भगाता है
इत्र बनाने के भी यह काम आता है
डायरिया, दमा और मूत्र रोग आते हैं
यह कितने ही रोगों को दूर भगाता है,
भारत ही नहीं कई देशों में मिलता है
हरियाणा के जंगलों में पनपता रहता
कठोर भूमि में भी पनपता बखूबी से
झोझरू को पाड़ आओ लेखक कहता।
***होशियार सिंह, लेखक, कनीना**
बथुआ
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चिनोपोडियम एलबम
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कभी-कभी किसानों के खेतों में उगने वाली खरपतवार ही किसानों के लिए लाभप्रद साबित हो जाती है जिसे न केवल किसान अपने पशुओं के चारे के रूप में अपितु सब्जी के रूप में भी प्रयोग करते हैं। इस प्रकार की खरपतवार बाजार में सब्जी के स्थान पर भी अपना स्थान बना लेती है और लोग जीवन भर उसका स्वाद लेते हैं। ऐसी ही एक खरपतवार दक्षिणी हरियाणा में बहुतायत में होती है जिसे बथुआ नाम से जाना जाता है।
दक्षिण हरियाणा के खेतों में अब बाथू नामक खरपतवार को भोजन के रूप में प्रयोग करने का रिवाज बढ़ता ही जा रहा है। सब्जी के रूप में यह पौधा बेहद पसंद किया जाता है। खेतों में भारी मात्रा में खड़े देखे जा सकते हैं। किसान अपने पशुओं का पेट भरने के अलावा इसे हरी पत्तेदार सब्जी के रूप में पसंद करने लगे हैं।
खरपतवार के रूप में अपने आप खेतों में उगने वाला 'बाथू ग्रामीण क्षेत्रों में महत्वपूर्ण शाक माना जाता है। कई रूपों में मानव के काम आता है वहीं पशुओं के लिए भी उत्तम हरे चारे का काम करता है। सर्दियों में फसल के साथ अपने आप उगने वाले इस हरे भरे शाक को ग्रामीण परिवेश के लोग बाथू,बथुआ या हरा नाम से पुकारते हैं जिसे आयुर्वेद में कई गुणों की खान व औषधियों में काम में लाया जाता है।
बाथू का किसी जमाने में गरीब तबके के लोग ही प्रयोग में लाते थे जो महंगी बाजार की सब्जी खरीदने में असमर्थ थे किंतु आजकल बदलाव आ गया है और अमीर एवं रोगी जनों के लिए रामबाण दवा का काम कर रहा है विशेषकर पेट की बीमारी एवं एनिमिया के शिकार इसे ढूंढते फिरते हैं। किसानों के लिए विशेषकर दक्षिण हरियाणा के किसानों के लिए बाथू एवं खरथू सिरदर्द बन जाते हैं। कीटनाशकों के प्रयोग तथा आधुनिक कृषि के यंत्रों द्वारा जुताई के चलते बाथू की मात्रा कम होती जा रही है। दिसंबर से जनवरी माह में किसान खेतों में निराई करते हैं और इस शाक को उखाड़ फेंकते हैं क्योंकि यह पैदावार में बाधक बन जाता है। डाक्टर और हकीम इसे खून की कमी वाले व्यक्तियों और रक्त शोधक के रूप में उपयोग करने की सलाह देते हैं। इसके पत्ते गहरे हरे तथा टहनियां भी हरी होती हैं। इसके पत्तों और टहनियों पर सदा सफेद रंग का पाउडर पाया जाता है जिसके चलते इसे एलबम नाम से जाना जाता है। इसे 'चिनोपोडियम एलबम वैज्ञानिक नाम से जाना जाता है।
किसान निराई के वक्त खेतों से उखाड़कर घर लाते हैं और इससे रायता,भाजी तथा देशी तरकारी बनाने के काम में लेते हैं। जायकेदार परांठें भी खाए जाते हैं। बूढ़े-बुजुर्ग बथुआ के रायते को बेहद पसंद करते हैं वही भाजी एवं देशी सब्जियां जायकेदार होती हैं। बाथू को उबालकर इसके निचोड़े हुए पानी को आटा गूंथने में काम में लेते हैं। इसी जल से स्नान करने से शरीर में चमक भी आती है और बाल कोमल बनाने के रूप में भी प्रयोग करते हैं। कच्चे व पकाकर खाना दोनों ही रूपों में यह लाभकारी माना जाता है। यही कारण है कि शहरों में हाटों पर बिकता है। पेट की कितनी ही बीमारियां इसके नियमित कुछ दिनों तक प्रयोग करने से समाप्त हो जाती हैं। यही कारण है कि बाथू को ग्रामीण क्षेत्रों का अमूल्य उपहार माना जाता है।
बाथू जब बड़ा हो जाता है तो उत्तम पशु आहार बन जाता है। इसे चारे के रुप में काम में लेते हैं। ग्रामीण परिवेश में इसे हरा नाम से जाना जाता है। दुधारू पशुओं के लिए बाथू हरे चारे के रूप में काम में लाया जाता है। बाथू में लोह,विटामिन बी एवं सी,कैरोटीन तथा खनिज लवणों की भारी मात्रा पाई जाती है। यही कारण है कि कुछ रोगों के इलाज में कारगर सिद्ध होता है विशेषकर शरीर के हुकवॉर्म समाप्त करने के काम आता है। जब बदहजमी का रोग हो जाए तो इसका उपयोग लाभप्रद होता है। बाथू के परांठें एवं रोटियां आजकल अति प्रसिद्ध होती हैं। डाक्टर तथा वैद्य इसे बगैर निचोड़े ही प्रयोग करने की सलाह देते हैं। किसान के खेतों में उगने वाली अनेकों खरपतवारों में बाथू का नाम ही सर्वोपरि होता है जो भोजन का अंग बन चुका है।
बाथू आजकल किसानों के लिए आय का साधन बनता जा रहा है। इसके गुणों को देखते हुए अमीर जन इसे बाजार से खरीद कर लाते हैं और बड़े ही चाव से खाते हैं जिससे सिद्ध होता है कि बीते जमाने की गरीबों की सब्जी अब अमीरों का भोजन बनती जा रही है। बाजार में किसान इसे उखाड़कर बेच रहे हैं और आमदनी कर रहे हैं।
सब्जी महंगी होने के कारण किसान वर्ग न केवल खेतों में खरपतवार के रूप में उगने वाले बाथू को सब्जी के रूप में प्रयोग कर रहे हैं वहीं खेतों से उखाड़कर दूसरों को भी खाने की प्रेरणा दे रहे हैं। बाथू गुणकारी औषधि के रूप में जानी जाती है।
उल्लेखनीय है कि बाथू मानव के काम तो आता है वहीं पशुओं के लिए भी उत्तम हरे चारे का काम करता है। सर्दियों में रबी फसल के साथ अपने आप उगने वाले इस हरे भरे शाक को ग्रामीण परिवेश के लोग बाथू, बथुआ या हरा नाम से पुकारते हैं जिसे आयुर्वेद में कई गुणों की खान व औषधियों में काम में लाया जाता है।
किसानों का कहना है कि बाथू का किसी जमाने में गरीब तबके के लोग ही प्रयोग में लाते थे जो महंगी बाजार की सब्जी खरीदने में असमर्थ थे किंतु आजकल बदलाव आ गया है और अमीर एवं रोगी जनों के लिए रामबाण दवा का काम कर रहा है विशेषकर पेट की बीमारी एवं रक्त की कमी(एनीमिया)के शिकार इसे ढूंढते फिरते हैं। उनका कहना है कि जब बाजार में अन्य सब्जियों आसमान छू रही है तो ऐसे में बाथू ही गुणकारी सब्जी का काम करेगा। ये किसान स्वयं भी इसे प्रयोग कर रहे हैं और दूसरों को भी इसे खाने की सलाह दे रहे हैं।
किसानों ने बताया कि वे इसे रायता, देसी सब्जी बनाने में प्रयोग कर रहे हैं वहीं आटे में मिलाकर रोटियां बना रहे हैं वहीं इससे जायकेदार पराठे भी बना रहे हैं। ये व्यंजन उनको बहुत अधिक भा रहे हैं। यही नहीं अपितु वे सरसों का साग व अन्य खेतों में पाई जाने वाली हरी सब्जियां प्रयोग में ला रहे हैं।
खून की सभी प्रकार की बीमारियों एवं खून की कमी वालों के लिए बाथू गुणकारी है। इसके नियमित रूप से प्रयोग करने से पेट की बीमारियां भी दूर हो जाती हैं। ऐसे में किसान एवं सभी लोगों को खेतों की इस खरपतवार का उपयोग विभिन्न रूपों में करना चाहिए।
खरपतवार के रूप में अपने आप खेतों में उगने वाला 'बाथू ग्रामीण क्षेत्रों में महत्वपूर्ण शाक माना जाता है। कई रूपों में मानव के काम आता है वहीं पशुओं के लिए भी उत्तम हरे चारे का काम करता है। सर्दियों में फसल के साथ अपने आप उगने वाले इस हरे भरे शाक को ग्रामीण परिवेश के लोग बाथू, बथुआ या हरा नाम से पुकारते हैं जिसे आयुर्वेद में कई गुणों की खान व औषधियों में काम में लाया जाता है।
बाथू का किसी जमाने में गरीब तबके के लोग ही प्रयोग में लाते थे जो महंगी बाजार की सब्जी खरीदने में असमर्थ थे किंतु आजकल बदलाव आ गया है और अमीर एवं रोगी जनों के लिए रामबाण दवा का काम कर रहा है विशेषकर पेट की बीमारी एवं एनीमिया के शिकार इसे ढूंढते फिरते हैं। किसानों के लिए विशेषकर दक्षिण हरियाणा के किसानों के लिए बाथू एवं खरथू सिरदर्द बन जाते हैं। कीटनाशकों के प्रयोग तथा आधुनिक कृषि के यंत्रों द्वारा जुताई के चलते बाथू की मात्रा कम होती जा रही है। दिसंबर से जनवरी माह में किसान खेतों में निराई करते हैं और इस शाक को उखाड़ फेंकते हैं क्योंकि यह पैदावार में बाधक बन जाता है। डाक्टर और हकीम इसे खून की कमी वाले व्यक्तियों और रक्त शोधक के रूप में उपयोग करने की सलाह देते हैं। इसके पत्ते गहरे हरे तथा टहनियां भी हरी होती हैं। इसके पत्तों और टहनियों पर सदा सफेद रंग का पाउडर पाया जाता है जिसके चलते इसे एलबम नाम से जाना जाता है। इसे 'चिनोपोडियम एलबम वैज्ञानिक नाम से जाना जाता है।
किसान निराई के वक्त खेतों से उखाड़कर घर लाते हैं और इससे रायता,भाजी तथा देशी तरकारी बनाने के काम में लेते हैं। जायकेदार परांठे भी खाए जाते हैं। बूढ़े-बुजुर्ग बथुआ के रायते को बेहद पसंद करते हैं वही भाजी एवं देशी सब्जियां जायकेदार होती हैं। बाथू को उबालकर इसके निचोड़े हुए पानी को आटा गुथने में काम में लेते हैं। इसी जल से स्नान करने से शरीर में चमक भी आती है और बाल कोमल बनाने के रूप में भी प्रयोग करते हैं। कच्चे व पकाकर खाना दोनों ही रूपों में यह लाभकारी माना जाता है। यही कारण है कि शहरों में हाटों पर बिकता है। पेट की कितनी ही बीमारियां इसके नियमित कुछ दिनों तक प्रयोग करने से समाप्त हो जाती हैं। यही कारण है कि बाथू को ग्रामीण क्षेत्रों का अमूल्य उपहार माना जाता है।
बाथू जब बड़ा हो जाता है तो उत्तम पशु आहार बन जाता है। इसे चारे के रूप में काम में लेते हैं। ग्रामीण परिवेश में इसे हरा नाम से जाना जाता है। दुधारू पशुओं के लिए बाथू हरे चारे के रूप में काम में लाया जाता है। बाथू में लोह,विटामिन बी एवं सी,कैरोटीन तथा खनिज लवणों की भारी मात्रा पाई जाती है। यही कारण है कि कुछ रोगों के इलाज में कारगर सिद्ध होता है विशेषकर शरीर के हुकवोर्म समाप्त करने के काम आता है। जब बदहजमी का रोग हो जाए तो इसका उपयोग लाभप्रद होता है। बाथू के परांठे एवं रोटियां आजकल अति प्रसिद्ध होती हैं। डाक्टर तथा वैद्य इसे बगैर निचोड़े ही प्रयोग करने की सलाह देते हैं। किसान के खेतों में उगने वाली अनेकों खरपतवारों में बाथू का नाम ही सर्वोपरि होता है जो भोजन का अंग बन चुका है।
बाथू आजकल किसानों के लिए आय का साधन बनता जा रहा है। इसके गुणों को देखते हुए अमीर जन इसे बाजार से खरीद कर लाते हैं और बड़े ही चाव से खाते हैं जिससे सिद्ध होता है कि बीते जमाने की गरीबों की सब्जी अब अमीरों का भोजन बनती जा रही है। बाजार में किसान इसे उखाड़कर बेच रहे हैं और आमदनी कर रहे हैं।
ग्रामीण ही नहीं अपितु शहरी क्षेत्रों में बथुआ को कई रूपों में प्रयोग किया जा रहा है। कुछेक पकवान, सब्जी निम्र बनाए जाते हैं-
परांठे-बथुआ को कच्चा ही काटकर आटे में मिलाकर परांठे बनाकर बड़े चाव से खाए जाते हैं। देसी घी में बनाए गए परांठे बथुआ की भाजी के संग खाने का लुत्फ ही अलग है।
भाजी-बारीक काटकर बथुआ को पहले उबाला जाता है और इसे निचोड़कर भाजी बनाई जाती है। निचोड़ा हुआ बथुआ जल आटा गुथने के काम आता है।
रायता-बथुआ काटकर, उबालकर, निचोड़कर दही या छाछ में डालकर व उसमें मसाले डालकर बेहतर एवं पौष्टिक रायता बनाया जाता है।
सब्जी-बथुआ को दाल में डालकर, आलू के संग तथा कई अन्य सब्जियों में मिलाकर पकाकर खाया जाता है।
बथुआ के कई अन्य उपयोग भी हैं। रक्त की कमी को झटपट दूर करता है। पालक की भांति इसमें भी पौष्टिक गुण होते हैं। न केवल इंसान के लिए अपितु किसान के पशुओं के लिए भी उत्तम चारा बनता है। जो किसान अपने घर में पालक का प्रयोग नहीं कर पाता है वह बथुआ प्रयोग कर सकता है।
**होशियार सिंह, लेखक,कनीना,हरियाणा**
झुंडा
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सक्रम बंगालेंस
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खेती की भूख ने किसानों के खेतों में उगने वाले झुंडा को समाप्त कर दिया है। कभी झोपड़ पट्टी में छांव का आनन्द लिया जाता था वहीं बारिश में इन झोपडिय़ों की छटा ही निराली थी। झुंडा के मूंज, पानी, तुली, सरकंडा आदि भाग होते हैं।
किसी जमाने में किसान के खेतों के चारों ओर बहुतायत में पाए जाने वाले झुंडा आज लुप्त होने की कगार पर जा पहुंचा है। किसानों को आवारा पशुओं से कभी ये झुंडा बचाता था और उनकी तुली से सरकी बनाई जाती थीं वो आज देखने को भी नहीं मिल रही हैं। झुंडा से जो झोपड़ पट्टी बनाई जाती थी वो बारिश में किसान को अपार खुशी देती थी। कभी किसानों के घर प्राय कच्ची मिट्टी के बने होते थे और इन कच्चे घरों में झुंडा का अहं रोल होता था। झुंडा का वैज्ञानिक नाम सक्रम बंगालेंस है।
किसान के लिए झुंडा खेत की मेंढ़ पर लगाए जाते थे जो किसान की खड़ी फसल को आवारा जंतुओं से बचाते थे वहीं किसान इन झुंडों से प्राप्त होने वाली कच्ची तुली से विभिन्न खिलौने बनाकर अपने बच्चों का मन बहलाता था। जब झुंडा पककर तैयार हो जाता था तो उसकी तुली पर पाया जाने वाला धागा जिसे मूंज कहते हैं, से चारपाई को भरने के काम में लिया जाता था। झुंडा सूख जाता था तो उससे झोपड़ी बनाई जाती थी। झुंडा का प्रयोग मृतक व्यक्ति के लिए भी किया जाता था और आज भी किया जा रहा है। अब झुंडा से बनी झोपड़ी किसी शाही व्यक्ति के घर पर या फिर बड़े होटल में देखने को मिल रही हैं जहां शाही लोग आकर बड़ी अदब से भोजन ग्रहण करते हैं।
झुंडों की तुली बाजार में बिकती थी जिससे कुछ जाति विशेष के लोग खरीदकर उससे सरकी बनाकर बेचते थे। ईंट भ_ा पर रहने वाले लोग इन सरकी को खरीदकर गुजर बसर करते थे। झुंडा से विभिन्न प्रकार की झोपड़ी बनाई जाती थी। किसी जमाने में ये झोपड़ी देखने लायक होती थी। रईस व्यक्ति भी सुंदर झोपड़ी बनवाते थे। आज किसान उन झोपडिय़ों को भूल चुका है। इसके पीछे धन की अधिकता एवं पक्के मकानों की बाढ़ आना अहं माना जाता है।
आज का किसान कम सहनशील होने के कारण मेंढ पर दो किसानों को लड़ते देखा जा सकता है। मेंढ़ को लेकर ही उस पर उगने वाले झुंडों को उजाड़ दिया गया है। ये झुंडे अनेक जीवों की शरणस्थली होत थे। तीतर, बटेर एवं सरीसृप इन झुंडों का उपयोग करते थे। झुंडे समाप्त क्या हुए आवारा एवं जंगली जीव बेवजह मारे गए। किसान ने खेत से इन झुंडों को उखाड़ फेंका है जिसके पीछे माना जा रहा है कि जोतने वाली जमीन बढ़ाई जाना है। ये झुंडा जगह अधिक घेरते हैं। किसान ने इनको उखाड़ फेंका है जिसके चलते आवारा जंतुओं के घर समाप्त हो गए हैं।
झुंडा बहुत कीमती पौधा होता है। आवारा जंतुओं को शरण देता है वहीं अनेकों बेल उनमें ही उगकर गुजर बसर करती हैं। झुंडा के पत्ते अति कोमल होने के कारण बया पक्षी उसके पत्तों का उपयोग करके अपना सुंदर घर बनाता था। अब ये बया पक्षी अपना घर बनाने में असफल हो जाते हैं जिसके चलते ये पक्षी भी अन्यत्र पलायन कर रहे हैं। झुडा से भारी मात्रा में सूखा ईंधन भी प्राप्त होता है। कुछ लोग झुंडा काटकर उसके अंदर सूखे हुए डंठल का उपयोग ईंधन के रूप में काम में लेते हैं। जब बारिश होती है तो ग्वालें इस झुंडा के अंदर पाए जाने वाले सूखे डंठल से आग जलाकर अपने को गर्म करते हैं।
आज किसान ने अपने हाथों से इस झुंडा को समाप्त कर दिया है। किसानों का कहना है कि पेट भरने के लिए अधिक जमीन की जरूरत होती है। ये झुंडा बहुत अधिक फैल जाते हैं और अधिक जगह घेरकर जमीन को कम कर देते हैं। ऐसे में झुंडा को उखाड़ फेंका है। झुडा जब हरी होता है तो कुछ पशु भी इसे खाकर अपना पेट भरते हैं।
झुंडा की पान्नी बहुत लाभकारी होती है जिसमें औषधीय गुण पाए जाते हैं। जिन पशुओं की जेर नहीं गिरती है उनकी जेर झुंडे की पानी से गिराई जा सकती है। यह पीलिया रोग में भी कारगर है। इस पौधे को झुंडा, पानी, मूंज, सरकंडा, हाथी घास आदि नामों से जाना जाता है।
झुंडा की तुली से विभिन्न प्रकार के खिलौने बनाए जाते थे जो अब देखने को नहीं मिल रहे है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में किसान के खेतों में कोई झुंडा नहीं देखने को मिलेगा।
कनीना के वनस्पति शास्त्री एचएस यादव कहते हैं कि झुंडा जहां कुछ रोगों में भी काम आता था और पर्यावरण के लिए लाभकारी होता था वो आज किसान ने अपने हाथों से उखाड़ दिया है। आने वाले समय में बच्चे झुंडा को पुस्तकों में ही पढऩे को मजबूर होंगे। अनेकों उपयोग झुंडा के होते थे वो झुंडा अब देखने को दूर दराज ही मिलता है। उनका कहना है कि अनेकों जीवों जैसे तीतर, बटेर, शशक, सांप, गोह एवं विभिन्न प्रकार के पक्षियों को सहारा देने वाला झुंडे का संरक्षण किया जाए आवारा जंतुओं की शरणस्थली बरकरार रहेगी वरना झुंडों में रहने वाले जीव भी लुप्त हो जाएंगे। झुंडा कम होने के कारण अब बया पक्षी के लिए भी अपना घर बना पाना कठिन हो गया है। बया पक्षी इस पत्ते के बारिक धागे से बया अपना घोसला बनाकर जीवन यापन करता है। अब झुंडा समाप्त होने की कगार पर होने के कारण बया को बाजरा, ज्वार, मक्का, गन्ना आदि को तलाशना पड़ रहा है। बया पक्षी को बचाने के लिए झुंडा का संरक्षण भी जरूरी बन गया है।
**होशियार सिंह, लेखक,कनीना,हरियाणा**





झुंडा
सक्रम बंगालेंस
पालक
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सर्दियों में गहरी हरी पत्तेदार सब्जियों में पालक प्रमुख पालक होता है। वैज्ञानिक भाषा में इसे स्पाइनेशिया ओलीरेसी नाम से जाना जाता है। यह कैल्शियम, मैग्नीशियम, सोडियम, पोटैशियम, फास्फोरस के अतिरिक्त विभिन्न विटामिनों से परिपूर्ण होता है। शीत ऋतु में अत्यधिक मात्रा में उगाया जाता है। यह पाला भी सहन कर सकता है। उसका तना एवं पत्ते सभी खाए जाते हैं। इसके फूलों में हवा द्वारा परागण होता है ऐसे में दो प्रजातियां पास पास नहीं बोनी चाहिए वरना शुद्ध रूप में नहीं पैदा हो पाएंगे।
पालक स्वास्थवर्धक सब्जी मानी जाती है जो लोहे से परिपूर्ण होती है। इसमें मिलने वाला लोहा शरीर द्वारा आसानी से सोख लिया जाता है। इसलिए पालक खाने से खून के लाल कणों में वृद्धि होती है और एनीमिया जैसा रोग नष्ट हो जाता है।
जो जन सेब जैसे महंगे फल नहीं खा सकते उन्हें पालक जरूर खाना चाहिए। यह हर स्थान पर उपलब्ध होता है तथा सस्ता भी होता है। पालक में लोहा, प्रोटीन, विटामिन ए और सी की प्रचुरता पाई जाती है। रक्ताल्पता को दूर करने में इसका अहम रोल होता है। लोहे की कमी से शक्तिहीन शरीर, निस्तेज हो जाता है वहीं शरीर में दुर्बलता आदि की परेशानियां आ जाती है। ऐसे में पालक खाने से हृदयघात कम, सीने व फेफड़ों की जलन में भी लाभप्रद है। पालक गुणकारी भाजी है। इसके जहां पराठे, भाजी, रायता, कोफ्ता विभिन्न प्रकार की सब्जियों में डालने के काम में लाया जाता है। इसकी सब्जी अति जायकेदार बनती है। चाहे पनीर पालक बनाना हो या फिर पालक आलू पालक की सब्जी, पालक सब्जी के गुणों में अंतर ला देता है।
पालक कई प्रकार के पाए जाते हैं। यह वजन घटाने में, कैंसर में लाभकारी माना जाता है वहीं आंखों के स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है, मस्तिष्क को स्वास्थ्य रखने, तंत्रिका तंत्र को सुचारू रखने एवं हड्डियों के को स्वस्थ रखने में अहं भूमिका निभाता है। ब्लड प्रेशर नियमित रखता है, एनीमिया के शिकार व्यक्ति पालक का उपयोग करके इस रोग से बच सकते हैं। स्वास्थ्य संबंधित अनेक समस्याओं को दूर करता है, रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। पालक खाने से शरीर को बहुत आराम मिलता है। पालक से मांसपेशियां स्वस्थ बनती है, आंखों के नीचे काले धब्बे हैं उन्हें भी दूर कर सकता है। पालक जरूर खाना चाहिए। अक्सर पालक कच्चा भी खाया जाता हैं वहीं पकाकर भी खाया जाता है। कई बार पालक का पानी निचोड़ कर फेंक दिया जाता है जो बहुत बुरी बात होती है। पालक के पानी को निचोड़कर जो पानी प्राप्त होता है उसे आटे को गूंथा जा सकता है। यहां तक कि बालों में पालक के पानी को लगाने से बाल भी स्वस्थ बनते हैं। पालक के जल से स्नान किया जाए तो भी शरीर में आराम मिलता है।
पालक एक ऐसी हरी सब्जी जो हर स्थान पर उत्पन्न होती है। यहां तक कि इसके अधिक देखरेख की आवश्यकता नहीं होती।
होशियार सिंह लेखक कनीना महेंद्रगढ़ हरियाणा
सरसों
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ब्रासिका कैंपेस्ट्रीज
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उत्तरी भारत में खाद्य तेलों का प्रमुख स्रोत सरसों है। सरसों जहां ब्रासिका कैंपेस्ट्रीज नाम से जानी जाती है वहीं यह पीले, भूरे, काले आदि कई रंगों में पाई जाती है जिनके अलग-अलग गुण और उपयोग है। सरसों सर्दी में उगाई जाने वाली एक फसल है जिसमें असंतृप्त वसा पाई जाती है। कमरे के ताप पर नहीं जमती इसलिए शरीर के लिए ज्यादा बेहतर मानी जाती है।
पुराने समय से विभिन्न प्रकार के पदार्थ सरसों से बनाए जाते रहे हैं। सरसों फूल आने से पूर्व गहरे हरे रंग में पाई जाती है जिसकी कई प्रकार की सब्जी बनाई जाती है। पंजाब में सरसों की का साग और मक्का की रोटी दूरदराज तक प्रसिद्ध है। भाजी,दाल सरसों, सरसों का रायता, आलू सरसों की सब्जी बनाकर खाई जाती हैं। वही सरसों का तेल सर्वोत्तम माना जाता है।
शरीर के लिए एक बेहतर तेल सरसों का ही है। वही आहार के रूप में विभिन्न प्रकार के पकवान बनाने में भी इसका कोई मुकाबला नहीं है। यही कारण है कि लोग देशी घी एवं वनस्पति घी को छोड़कर विशेषकर सरसों के तेल की ओर आकर्षित हो रहे हैं। सरसों पीले रंग की उत्सव में प्रयोग की जाती। सरसों को मस्टर्ड कहते है। वर्तमान के यूनानी भाषा के मस्टम से लिया गया है जिसका अर्थ है-युवा शराब। सरसों कुछ पेय बनाने के लिए भी काम में लाई जाती है। सरसों की सबसे बड़ी विशेषता है कि सरसों में वसा बहुत कम पाई जाती है। कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, शुगर फाइबर आदि भी बहुत कम मात्रा में मिलते हैं किंतु मैग्नीशियम ,पोटेशियम, सोडियम अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। इसकी महक विशेष प्रकार की होती जो दूर से महसूस की जा सकती है। यह एंटीबैक्टीरियल नाम से जानी जाती है जिसे लंबे समय तक स्टोर किया जा सकता है। सरसों तेल की मालिश की जाती है वहीं उत्तरी भारत में बेहतरीन फसल है। किसानों के लिए जहां ईंधन भी प्रदान करती है वहीं उनकी आय का स्रोत है। सरसों किसानों के लिए चारा प्रदान करती है जिसे दुधारू पशुओं का पालन करते समय प्रयोग करते हैं। सरसों का तेल सभी ट्रेनों में बेहतर माना जाता है। यह हृदयघात, बीपी तथा विभिन्न शारीरिक रोगों से बचाने में अहं रोल अदा करती है।
** होशियार सिंह, लेखक कनीना, महेंद्रगढ़ हरियाणा**
पोथी
हिंदी शिक्षक ने कक्षा में
सिखाई एक सुंदर सीख
मेहनत कर सदा कमाना
मांगना नहीं कभी भीख,
शिक्षा से हल हो जाएगी
चाहे कैसी बड़ी कठिनाई
शिक्षा जिसने मन से पाई
जगत में नहीं होगी हंसाई,
जीना बस एक शान से ही
चाहे चार दिनों की जिंदगी
गरीब, नारी और भिखारी
दिखलाना उन पर बंदगी,
रामायाण, गीता, महाभारत
कहलाती अति सुंदर पोथी
जो इनका अध्ययन ना करे
उसकी किस्मत मिले खोटी।
**होशियार सिंह, लेखक,कनीना,हरियाणा**