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Wednesday, May 27, 2020






 

 सांटी

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पुनर्नवा
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शोथहीन/गदहपूरना
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बोरहविया डिफूजा
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सांटी एक बहुवर्षीय पौधा होता है जो अक्सर धरती पर फैलता है। यह दो-तीन मीटर लंबा हो सकता है। विषम परिस्थितियों में यह शांत पड़ा रहता है और जब भी मौसम अनुकूल हो इस पर पत्ते नजर आते हैं। इस प्रकार यह फिर से नया बन जाता है। यह पौधा बुढ़ापा रोकने में कारगर साबित होता है।
 सांटी के पत्ते प्राय हरे रंग के, गोल नजर आते हैं। वास्तव में पुनर्नवा का अर्थ है फिर से नया होने वाला अर्थात जब यह पौधा मौसम प्रतिकूल होता है तो अपने आप को समेट लेता है, पत्तियां  एवं टहनी खत्म हो जाती है किंतु जब बारिश होती है या पानी की आपूर्ति होती है फिर से यह नया बन जाता है और नया जीवन धारण करने के कारण इसे पुनर्नवा कहते हैं।
 वास्तव में जीर्ण शीर्ण अवस्था आने पर फिर से नया रूप धारण करता है। मुनियों ने इसका नाम पुनर्नवा रखा है। इसकी कई प्रकार पाई जाती है किंतु सबसे बेहतरीन सफेद फूल वाला, हरे रंग का, धरती पर फैलने वाला होता है जिसे बोरहविया  डिफ्यूजा कहते है। इसमें औषधीय गुण पाए जाते हैं। यह हरे रंग का होता है इससे मिलता-जुलता एक और पौधा लाल रंग का होता है जिसे लाल पुनर्नवा कहते हैं।
  सांटी शाक खेतों में, सब्जियों में, उगाये गए फसल में, सड़क के किनारे, ट्रेन की पटरी के साथ-साथ अधिक मात्रा में मिल जाता है। यह विषम परिस्थितियों को सहन करने वाला होता है। इस पौधे में भारी मात्रा में काले रंग के बीज निकलते हैं जिनकी तीखी गंध होती है।
  आयुर्वेद की नजर में गर्म, कफ नाशक, रूखा सूजन मिटाने वाला, पीलिया रोग में लाभप्रद, खांसी और पीड़ा में बहुत लाभप्रद है। इस पौधे में वास्तव में एलकेलोइडस पाए जाते हैं जिन की मात्रा 6 फीसदी के करीब होती है। इसमें जल मे न घुलने वाला पदार्थ भी पाया जाता है जिसे स्टेरॉन कहते हैं। इसमें बहुत से कार्बनिक अमल पाए जाते हैं साथ में पोटैशियम नाइट्रेट, सोडियम सल्फेट आदि मिलते हैं।
यह पौधा शाक के रूप में मिलता है जो कई बार भूमि पर खड़ा भी हो जाता है। भारत में अक्सर यह दवाओं में काम आता है और जंगल में स्वयं उगता है। लोग इसकी जड़, पत्ते और बीज काम में लेते हैं। इसकी जड़ लंबी और मोटी होती है जो फूली हुई होती है। पत्ते सूप बनाने , ग्रामीण क्षेत्रों में यह खाटा का साग, कढ़ी में में प्रयोग किया जाता है। इसको पकाकर भाजी बनाई जाती है। यह पौधा विषाणु के लिए होस्ट का काम भी करता है अर्था तविषाणु इसी पर आश्रित रहते हैं।
  सांटी को अलग अलग क्षेत्रों में कई हो गई नाम से भी जाना जाता है । जड़ सहित पूरे पौधे को काम में लेते हैं। यह कड़वा मूत्र वर्धक, रेचक और पेट के लिए लाभप्रद माना जाता है। इसका उपयोग गैस्ट्रिक गड़बड़ होने, अस्थमा, पीलिया, एनीमिया आदि में किया जाता है। सांप के जहर को नष्ट करने के काम में लेते हैं। पत्तियों का काढ़ा पीलिया रोग दूर करने के लिए किया जाता है। वही लीवर की समस्या को मिटाने के लिए भी पत्तियों का उपयोग किया जाता है। पेट की बीमारियों में बहुत लाभप्रद है। पेचिश के इलाज में काम में लाया जाता है। उबली हुई जड़े अल्सर, फोड़ा फुंसी आदि में उपयोगी है।
पुनर्नवा किसान के लिए ही नहीं इंसान के लिए भी वरदान साबित होता है। यह सैकड़ों प्रकार की समस्याओं इलाज में काम में लाया जाता है। अनेक दवाइयां इसी से बनी होती हैं। यह आंखों के रोग, दमा, हृदयरोग, उदर रोग, प्लीहा के रोग गुर्दे की बीमारी, अनिद्रा में विशेष रूप से काम में लाया जाता है। बच्चों की खांसी, जहरीले कीटों के काटने पर इलाज करने के काम में लाया जाता है। इसलिए इसे धरती का वरदान माना जाता है।
  पुनर्नवा मोटापा दूर करने के लिए प्रयोग की जाने वाली हर्बल दवाओं में काम में लाया जाता है क्योंकि इसमें पोटेशियम पाया जाता है। कैंसर में भी लाभप्रद है वहीं तनाव दूर करने, मधुमेह दूर करने में अहम योगदान है। यह भी माना जाता है कि एक बूढ़े व्यक्ति को फिर से जवानी की ओर ले जा सकता है। इसलिए इसे पुनर्नवा से संबोधित करते हैं।
 पीलिया में तो रामबाण है वही बुखार, कमजोरी जैसे लक्षण नजर आए तो उस समय यह प्रयोग किया जाता है। जिगर की समस्या हो, गुर्दे की समस्या हो तो काम आता है। गठिया के इलाज में इसकी जड़ काम में लेते हैं।
क्षेत्रों में ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ लोग इसके उपयोग को जानते हैं। यही कारण है कि विशेष शाक के रूप में काम में लेते हैं। कुछ लोग इसको देखकर दूर भागते हैं क्योंकि उनको इस पौधे के बारे में कोई ज्ञान नहीं होता है।
सांटी का पौधा पौष्टिक एवं गुणों से परिपूर्ण होता है जिसमें लोहा, प्रोटीन, कैल्शियम, सोडियम, पोटैशियम आदि तत्व पाए जाते हैं। वास्तव में यह पौधा शरीर से मल को बाहर निकालने में लाभप्रद होता है। यह मधुमेह, दमा, उच्च रक्तचाप ,बुढ़ापे को रोकने में,बालों के रोगों की समस्या मितटाता है। पथरी को दूर करने के लिए दूध में उबालकर सुबह-शाम पीते हैं, वहीं पागल कुत्ते के काटने पर भी यह काम में लाया जाता है, खूनी बवासीर योनि शूल, जलोदर, हाथी पाव जैसे रोगों में काम में लेते है।
  
इसकी बुद्धि पुनर्नवा धनवती नाम से जानी जाती है। यदि कोई उम्र भर जवान एवं निरोग की रहना चाहता चाहत रखता है तो वह सांटी का उपयोग कर सकता है।
यह पाचन क्रिया को ठीक करता है, वजन घटाता है वही चर्म रोग में लाभकारी है। आंखों से पानी गिरता है तो इसके जड़ को शहद में मिलाकर पीने से लाभ होता है। फोड़ा फुंसी के इलाज में इसे देसी घी में मिलाकर पीते हैं। एलर्जी, खून साफ करने आदि में ही का उपयोग किया जाता है।
**होशियार सिंह, लेखक,कनीना,हरियाणा*
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सांटी या पुनर्नवा
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     (बोराहविया डिफूजा)
शास्त्रों और आयुर्वेद में
भरा हुआ जिसका नाम
सांटी उसे गांवों में कहते
पुनर्नवा कहलाए बेदाम,

                 पूरे विश्व में मिलता शाक
                 गर्मी में यह सूख जाता है
                 बारिश में फिर हो जीवित
                अत: पुनर्नवा कहलाता है,

तीन प्रकार का यह होता
सफेद फूल का सर्वोत्तम है
खाए बुजुर्ग हो फिर जवान
शरीर का मिटाता सारे तम,

                         कढ़ी बनाओ या खाटा साग
                         फिर बनाकर खा लो भाजी
                        या सब्जी में डालकर खाओ
                        कर देता यह मन को राजी,

खून की कमी तन में आए
झटपट यह खून को बढ़ाता
पशुचारा कहलाए ये उत्तम
सर्वोत्तम ये फोडर कहलाता,

                     आंखों में जब हो जाते रोग
                     खा रही है इसको पूरी सृष्टि
                    खा लो इसको जी  भर  कर
                     बढ़ जाएगी आंखों की दृष्टि,

जब ब्लड शूगर बढ़ जाता
या फिर दिल का रोग सताए
औरत में हार्मोन असंतुलन
पुनर्नवा को घर में ले आए,

                     पेचिस के रोगाणु को मारती
                    कैसर में कहलाती गुणकारी
                    थकान मिटाती खून बढ़ाती



                   करो दोस्तों सांटी से ही यारी।
****होशियार सिंह, लेखक, कनीना****

Monday, May 25, 2020

नौतपा से बचाए पेड़ पौधों को
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हर वर्ष मई महीने के आखिरी सप्ताह में सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी कम हो जाती है जिसके चलते भीषण धूप/गर्मी पड़ती है। इस वक्त को रोहिणी नक्षत्र नाम से जाना जाता है। भारत में 25 मई से शुरू हो चुका है जो 8 जून तक चलता रहेगा। जब रोहिणी नक्षत्र लगता है तो सूरज की किरणे बहुत तेज धरती को तपाने लग जाती है। यह तपन पूरे नौ दिनों तक चलती है जिसके चलते पेड़ पौधों को भारी नुकसान होता है। उन्हें बचाना जरूर है। 3 जून को नौतपा का आखरी दिन होगा
साल में एक बार रोहिणी नक्षत्र की दृष्टि सूर्य पर पड़ती है।
यह नक्षत्र 15 दिन का होता है लेकिन  चंद्रमा जिन नक्षत्रों पर रहता है वह दिन नौतपा कहते हैं। इस वक्त अधिक गर्मी पड़ती है जो पृथ्वी के लिए लाभप्रद मानी जाती है। तेज गर्मी पडऩे से जहां बारिश होने की संभावना बढ़ जाती है। भारतीय ज्योतिष में नौतपा को वर्णित किया गया है। सूर्य देव प्रताप का प्रतीक है जबकि चंद्रमा शीतलता का।
 अधिक गर्मी पडऩे से जहां आंधी तूफान आने की संभावना बढ़ जाती है।
नौतपा एक खगोलीय प्राकृतिक घटना है ।इसके चलते उसका प्रभाव देखने को मिलता है जब नौतपा चले तो शरीर से पानी बहुत अधिक निकल जाता है। जिसके चलते डायरिया, पेचिस, उल्टी होने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसे समय में बाहर जाए तो चप्पल पहन कर, सिर को ढक कर जाए वरना बाल बहुत तेजी से सफेद हो जाएंगे। खीरा ककड़ी, तरबूज, खरबूजा आदि अधिक प्रयोग करना चाहिए। लस्सी, नींबू पानी मट्ठा बहुत बेहतर होते हैं।
वास्तव में पृथ्वी सूर्य के चारों ओर एक अंडाकार कक्ष में घूमती है। यह घूमते घूमते कभी सूर्य के पास आ जाती है तो बहुत अधिक गर्मी पड़ती है जबकि कभी दूर चली जाती है तो ठंड पड़ती है। जब सूर्य की किरणें लंबवत गिरती है उस समय ताप बढ़ जाता है। 21 जून को सबसे बड़ा दिन इसीलिए माना जाता है कि सूर्य बिल्कुल सिर के ऊपर से गुजरता है बाकी दिन सूर्य सिर के ऊपर से नहीं गुजरता। इस समय सूर्य पृथ्वी से सबसे ज्यादा दूरी पर हैं। पृथ्वी सूर्य से 15 करोड़ 15 लाख किलोमीटर की दूरी पर हैं। तब आग उगल रहा है जबकि 22 दिसंबर से 04 जनवरी तक सूर्य हमारे सबसे निकट होता है। पृथ्वी कीं सूर्य से दूरी 14 करोड़ 73 लाख किलोमीटर की दूरी पर था तब हम ठंड से ठिठुर रहे थे।
वास्तव में 25 मई से 03 जून तक का समय नौतपा का समय है। नोतपा में सूर्य की किरणें पृथ्वी पर सीधी गिरकर कम स्थान पर फैल रही है अब सूर्य की किरणें पृथ्वी पर 89.2 डिग्री के आसपास पहुंच रही है। इसलिये गर्मी तेजी से पडऱही है। इस समय तापमान अधिक होने का  मुख्य कारण सूर्य की किरणों का पृथ्वी के इस भाग पर सीधा गिरना है। वर्तमान समय में एक वर्ग किलोमीटर की किरणें एक वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर पङ़ती है जिससे हमें पूरी गर्मी लगती हैं। 15 जून को पृथ्वी पर सूर्य की किरणें 90 डिग्री पर पहुंचेगी। इसलिये इस समय गर्मी के यहीं हालात बने रहेंगे। 22 दिसम्बर से 04 जनवरी तक सूर्य हमारे सबसे निकट होता है फिर भी कड़ाके की ठंड पङ़ती है। इस समय सूर्य की किरणें पृथ्वी पर 45 डिग्री का कोण पर पृथ्वी पर पहुंचती हैं। सूर्य की एक वर्ग किलोमीटर की किरणें 1.5 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में पड़ती है जिससे गर्मी का अहसास कम होता है। यह वही बात है जैसे चाय कप में रखने पर गर्म रहतीं हैं प्लेट मे डाल दे तो कम गर्म महसूस होती है ।किसी भु भाग पर गर्मी सूर्य की किरणों के अलावा हवा की दिशा, पहाड़ी क्षेत्र, भूमि का ढाल, मिट्टी के प्रकार, पौधों की स्थिति, प्रदूषण पर निर्भर करती है।
पहाड़ की 165  मीटर की उंचाई पर जाने पर 1 डिग्री तापमान कम हो जाता है। अगर गर्म प्रदेश से हवा आ रहीं हैं तो तापमान और बढ़ेगा। कारखानों, वाहनों के अधिक होने वाले क्षेत्र में गर्मी ज्यादा होगी। समुद्र के आसपास वाले क्षेत्र में तापमान अधिक नहीं होता है क्योंकि पानी देर से गर्म होता है देर से ठंडा होता है। इसलिये समुद्र के आस-पास के क्षेत्र में न अधिक गर्मी पङ़ती है न अधिक ठंड पङ़ती है। सूर्य की परिक्रमा करती पृथ्वी से देखने पर सूर्य के पिछे रोहिणी नक्षत्र आ जाता है। 365 दिन में पृथ्वी की परिक्रमा अवधि के कारण सूर्य के पीछे रोहिणी नक्षत्र आना एक खगोलीय घटना है ।लगभग इन दिनों हर साल होती है अत: नोतपा ग्रीष्मकाल का कैलेंडर है आजकल लू का प्रकोप भी हो सकता है । खाली पेट घर से बाहर न निकले। सिर को कपड़े से ढक कर बाहर जाये। भोजन में प्याज का सेवन करे ।दिन में अधिक पानी का सेवन करे। नींबू का सेवन भी अधिक से अधिक करे। इस मौसम में पौधे जल जाते हैं उन्हें बचाये।

   ज्येष्ठ के महीने में गर्मी के कारण लोगों का हाल बेहाल हो जाए तो मानों नौतपा की शुरुआत हो जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में इसे सड़ी गर्मी नाम से जाना जाता है। भीषण गर्मी के दिन होते हैं वैज्ञानिकों के अनुसार नौतपा के दौरान सूर्य की किरणें सीधी धरती पर आती है तापमान बढ़ता है और बहुत अधिक गर्मी के कारण मैदानी क्षेत्रों में निम्न दबाव का क्षेत्र बनता है जो समुद्र की लहरों को आकर्षित करता। इसके कारण ठंडी हवाएं मैदानों की ओर बढ़ती है। क्योंकि समुद्र उच्च दबाव वाला क्षेत्र होते इसलिए हवाओं का यह रुख अच्छी बारिश का संकेत होता है।
नौतपा के दिनों में पानी अधिक से अधिक प्रयोग करना चाहिए वरना शरीर में पानी की कमी हो जाएगी। इन दिनों नींबू की शिकंजी अधिक से अधिक प्रयोग करना चाहिए जिससे भी लाभ हो सकता है। इन दिनों में तापमान जहां 45 डिग्री से अधिक पहुंच जाता है। इसी कारण से धरती तपने लग जाती है। जितनी धरती अधिकता तपेगी उससे धरती के अंदर पाए जाने वाले हानिकारक कीट नष्ट हो जाते हैं और बारिश का संकेत होता है। बारिश आती है तो बारिश भूमि में प्रवेश कर किसानों के लिए बीज बोने को इंगित करती है।
जिस प्रकार कड़ाके की सर्दी में पेड़ पौधे झुलस जाते हैं इसी प्रकार के अधिक गर्मी पडऩे से पेड़ पौधे नष्ट हो जाते हैं। पेड़ पौधों को प्रतिदिन पानी देना चाहिए। माना जाता है कि रात्रि के समय पौधों को पानी देने से ज्यादा लाभ होता है। अक्सर लोग गर्मी पड़ रही है दिन के समय पौधों को पानी देते हैं जिससे पौधे सर्द गर्म का शिकार हो जाते हैं और पौधे जल जाते हैं। ऐसे में रात्रि के समय पौधों को दिया गया पानी कुछ घंटों तक उन्हें आराम देता है। कभी भी धूप पड़ रही हो उस समय पानी नहीं देना चाहिए।
पौधों को बचाकर रखने का प्रयास किया जाए। इसके लिए छाया का प्रबंध हो, हो सके तो अस्थाई छाया का प्रबंध किया जाए ताकि पौधे बच जाए। एक बार सब्जी एवं छोटे पौधे बच जाएंगे तो आने वाली बारिश के समय बहुत तेजी से बढ़ेंगे।
नौतपा वास्तव में एक उपहार है। नौतपा न आए तो समझो जिंदगी में बारिश का मजा नहीं मिलेगा। इसके लाभ भी है वही हानि भी है। जहां शरीर का सारा मैल पसीने के जरिए निकल जाएगा। अक्सर लोग एसी और कूलर की हवा में बैठे रहते हैं जबकि होने चाहिए कि थोड़ा बहुत परिश्रम करें शरीर का पसीना निकलेगा जिससे शरीर में रोग होने की संभावना कम होगी। यही कारण है कि उन लोगों में रोग अधिक होते हैं जो आराम से दिनचर्या बिताते हैं।
इस समय सूर्य पृथ्वी से सबसे ज्यादा दूरी पर हैं । पृथ्वी सूर्य से 15 करोड़ 15लाख किलोमीटर की दूरी पर हैं तब आग उगल रहा है जबकि 22 दिसंबर से 04 जनवरी तक सूर्य हमारे सबसे निकट होता है । पृथ्वी कीं सूर्य से दूरी 14 करोङ 73 लाख किलोमीटर की दूरी पर था तब हम ठंड से ठिठुर रहे थे। क्या कारण हो सकता है?  25 मई से 02 जून तक का समय नौतपा का समय है । नौतपा में सूर्य की किरणें पृथ्वी पर सीधी गिरकर कम स्थान पर फैल रही है अब सूर्य की किरणें पृथ्वी पर 89.2 डिग्री के आसपास पहुंच रही है। इसलिये गर्मी तेजी से पड़  रही है इस समय तापमान अधिक होने का  मुख्य कारण सूर्य की किरणों का पृथ्वी के इस भाग पर सीधा गिरना है वर्तमान समय में एक वर्ग किलोमीटर की किरणें एक वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर पङ़ती हैं जिससे हमें पूरी गर्मी लगती हैं। 15 जून को पृथ्वी पर सूर्य की किरणें 90 डिग्री पर पहुंचेगी। इसलिये इस समय गर्मी के यहीं हालात बने रहेंगे। 22 दिसम्बर से 04 जनवरी तक सूर्य हमारे सबसे निकट होता है फिर भी कड़ाके की ठंड पङ़ती है । इस समय सूर्य की किरणें पृथ्वी पर 45 डिग्री का कोण पर पृथ्वी पर पहुंचती हैं। सूर्य की एक वर्ग किलोमीटर की किरणें 1.5 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में पङ़ती है जिससे गर्मी का अहसास कम होता है । यह वही बात है जैसे चाय कप में रखने पर गर्म रहतीं हैं प्लेट मे डाल दे तो कम गर्म महसूस होती है। किसी भू भाग पर गर्मी सूर्य की किरणों के अलावा हवा की दिशा, पहाड़ी क्षेत्र, भूमि का ढाल, मिट्टी के प्रकार, पौधों की स्थिति, प्रदूषण पर निर्भर करती है ।
पहाड़ की 165  मीटर की ऊंचाई पर जाने पर 1 डिग्री तापमान कम हो जाता है । अगर गर्म प्रदेश से हवा आ रहीं हैं तो तापमान और बढ़ेगा। कारखानों, वाहनों के अधिक होने वाले क्षेत्र में गर्मी ज्यादा होगी। समुद्र के आसपास वाले क्षेत्र में तापमान अधिक नहीं होता है क्योंकि पानी देर से गर्म होता है देर से ठंडा होता है। इसलिये समुद्र के आस-पास के क्षेत्र में न अधिक गर्मी पङती है न अधिक ठंड पङ़ती है ।सूर्य की परिक्रमा करती पृथ्वी से देखने पर सूर्य के पीछे रोहिणी नक्षत्र आ जाता है 365 दिन में पृथ्वी की परिक्रमा अवधि के कारण सूर्य के पिछे रोहिणी नक्षत्र आना एक खगोलीये घटना है । लगभग इन दिनों हर साल होती है अत: नोतपा ग्रीष्मकाल का कैलेंडर है आजकल लू का प्रकोप भी हो सकता है ।आप सभी से सुझाव है कि आप खाली पेट घर से बाहर न निकले। सिर को कपड़े से ढक कर बाहर जाये । भोजन में प्याज का सेवन करे। दिन में अधिक पानी का सेवन करे ।नींबू का सेवन भी अधिक से अधिक करे। 

नौतपा के दिनों में मृग मरीचिका बनती हैं। दूर सड़क पर ऐसा लगता है जैसे पानी है किंतु काल्पनिक पानी होता है। मृग प्यास बूझाने के लिए इसे देखकर प्राण त्याग देता हे। इसलिए इसे मृग तृष्णा कहते हैं। इंसान की हालात भी इसी प्रकार की होती है।



सूर्य देव की कृपा है, करते धूप का दान।
धूप बढ़े बारिश मिले, बढ़ जाती है शान।।
--होशियार सिंह, लेखक,कनीना,महेंद्रगढ़ हरियाणा**
**होशियार सिंह, लेखक  कनीना हरियाणा
 
 
 
 

Sunday, May 24, 2020




सोहंजना 
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प्रकृति का अद्भुत पेड़
                 ड्रमस्टिक ट्री कहलाए
मोरिंगा है वंश इसका
                  रामबाण पेड़ जाना जाए,

मदर्स बेस्ट फ्रेंड नाम
                  महिला में दूध को बढ़ाए
खनिज लवणों से भरा
                   विटामिन स्रोत जाना जाए,

जड़, तना, पत्ती, फूल
                   फल काम में लाया जाए
हर रोग में बेहतर यह
                   फल काटकर सब्जी बनाए,

पत्तों से सलाद अचार
                   बीजों का तेल बहु उपयोगी
बीपी, शूगर हो कैंसर
                   सभी रोगों में काम में आए,

पेट रोग या जोड़ दर्द
                   एड्स, तनाव, बुढ़ापा आए
अद्भुत पौधा लो प्रयोग
                   रोग, बुढ़ापा पास नहीं आए,

पत्तों को नमक जल धो
                    छांव में उनको लो सुखाए
बारिक पीस कर छानो
                    रोटी, सब्जी मिलाकर खाए,
जड़ है होर्सरेड्डिश जैसी
                    अत: यह होर्सरेड्डिश कहलाए



आस पड़ोस में खड़ा है
                     सोहंजना घर में लाकर खाए।।
**होशियार सिंह, लेखक, कनीना** 

सहजन
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ड्रमस्टिक प्लांट
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****************************************** मोरिंगा ओलेइफेरा
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मोरिंगा ओलेइफेरा सहजन/ सहजना जिसे सेजना, सजना,मोरिंगा आदि नामों से जाना जाता है। यह एक वृक्ष होता है जिसका वैज्ञानिक या वानस्पतिक नाम मोरिंगा ओलेइफेरा है। यह बहु उपयोगी पेड़ है। इस पेड़  के विभिन्न भाग पोषक तत्वों से परिपूर्ण मिलते हैं। इसलिए सभी भाग इसके उपयोग माने जाते हैं।
   मानव हो या पशु सभी के रोगों के इलाज में भी कारगर औषधि का काम करता है। इसकी पत्तियां और फली भी जहां सब्जी बनाने के काम आती है वही जल को स्वच्छ करने के लिए यह उत्तम पदार्थ है। हाथ की सफाई के लिए उपयोग किया जाता है वही सैकड़ों जड़ी बूटियां इसी से बनती है।
 इसकी कच्ची हरी पत्तियां बहुत उपयोग में लाई जाती है परंतु यह पौधा इतना कमजोर होता है कि आसानी से टूट जाता है। यह कार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन, विटामिन-ए ,विटामिन बी-1, विटामिन बी-2, बी-3, बी-6, बी-9, विटामिन सी कैल्शियम,  मैग्नीशियम, सोडियम आदि पाया जाता है।
सहजन का लगभग सभी भाग काम मेंं लाया जाता है। इसकी पत्ती, फूल, फल, बीज,  छाल जड़ , बीज से प्राप्त तेल आदि खाए जाते और उपयोग में लाए जाते हैं। विभिन्न महाद्वीपों में कच्ची फलियां खाई जाती है। यह विभिन्न देशों में पाया जाता है।
 कुछ देशों में तो इसकी फलियां खाई जाती है जबकि कुछ देशों में इसके पत्ते अधिक पसंद किए जाते वही फूलों को पकाने वाले लोग भी कम नहीं है। इसका स्वाद खुंभी  जैसा होता है इसलिए जो लोग खुंभी नहीं खा पाते वे इसका उपयोग करते हैं। इसकी छाल पतियां, छाल, जड़ व  फूलों से विभिन्न दवाई बनाई जाती है। कुछ जगह इसके पत्तों से नीली डाई भी बनाई जाती है।
कई देशों में इसे उगाया जाता है लेकिन इसे अधिक पानी की जरूरत नहीं होती। वही हर प्रकार की मिट्टी में उगने की क्षमता रखता है। जब इस की फली पक जाती है तो फट जाती है और इसके बीज दूरदराज तक बिखर जाते हैं या हवा में उड़कर देूर चले जाते हैं। इस पौधे की सबसे बड़ी विशेषता है किसके बीज उगने की क्षमता बहुत अधिक होती अधिकांश बीज उग जाते हैं और यह जल्दी ही बड़ा हो जाता है।
यह जंगल में भी मिलता है वही लोग इसको अपने बाग बगीचे में भी शोभा के लिए उगाते हैं। जबकि फलियां कच्ची होती है तो उन्हें तोड़कर लोग बड़े चाव से सब्जी बनाकर खाते लेकिन इसकी फलियां अधिक दिनों तक नहीं टिकती और बहुत जल्द पक जाती है।
 पत्ते बहुत अधिक मात्रा में उत्पन्न होते हैं और गहरे हरे रंग के होते हैं। इसलिए इसके पत्ते खाद का काम करते हैं। इसके बीजों से तेल निकाला जाता है जो बाल और त्वचा के लिए बहुत लाभप्रद होता है। इस पौधे पर किसी रोग का कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता किंतु विभिन्न कीट इसके पत्तों पर जरूर पनप सकते हैं।
इसके पत्तों में बहुत अधिक लोहा पाया जाता है जिसमें विटामिन ए, बी, सी ,के इसके बीज के तेल में मैंगनीज और प्रोटीन बहुत अधिक मात्रा में पाई जाती है। इसलिए इसके पत्ते पालक की तरह प्रयोग किए जाते हैं। उसका पाउडर सूप और सॉस बनाने के काम आता है। बीज के दाने कुछ लोग खाने के काम में लेते हैं जिसमें रूक्षांस, पोटेशियम मैग्नीशियम आदि तत्व पाए जाते हैं जो स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभकारी हैं।
 इसके बीज मटर के दानों की भांति भून कर खाए जाते हैं जिनमें विटामिन-सी और बी मिलता है। इसके बीज से निकाला गया तेल कहीं औषधियों में काम में लाया जाता है वही बीज से तेल निकालने के बाद बच्चा हुआ कचरा पानी साफ करने और खाद के रूप में काम में लाया जाता है। इसकी जड़े मसालों के रूप में काम में लाई जाती है।
 जिन व्यक्तियों में लोहे की कमी पाई जाती है उनके लिए इसके पत्ते बहुत लाभप्रद होते जिनमें लोहा पाया जाता है। इसलिए
इस पौधे को ड्रुमस्टिक पौधा नाम से जाना जाता है। सजना पेड़ कहीं भी आसानी से लग जाते हैं और पानी की जरूरत अधिक नहीं होती इसलिए पूरे भारत में बहुत फैला हुआ है। सहेजने की सूखी पत्तियां केले की भांति बहुत लाभप्रद होती हैंजिनमें  प्रोटीन पाया जाता है जो मांसाहार स्रोतों से मिले प्रोटीन से कम नहीं होता।
 इसके फल जहां जोड़ों के दर्द शरीर के रोग, एड्स के इलाज में काम में लाया जाता है। यह पौधा शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता ,है पेट की कब्ज ,कीड़े आदि दूर करता है वही वजन घटाने में इसका कोई मुकाबला नहीं है वह तो बड़ा योगदान है। यदि पर प्रसूता स्त्री को इस पौधे की पत्ती घी में गर्म करके दी जाए तो जन्म के बाद कमजोरी नहीं कमजोरी और थकान नहीं आएगी। बच्चे का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। यह खून के में शुगर को संतुलित, हृदय के लिए बहुत लाभकारी है। यह कैंसर रोधी माना जाता है वही यदि गुर्दे की पथरी को रोकने वाला होता है। खून के थक्के जमाने के गुण होते हैं। यही कारण है कि शरीर में कहीं चोट लगने से खून बहता है तो उसको आसानी से पौधे की सहायता से रोका जा सकता है।
 इस पौधे कममात्रा में ही खाना चाहिए अधिक मात्रा में खाने से कुछ साइड इफेक्ट दिखाई देते है। सजना पौधा अति गुणकारी है इसलिए घरों में जरूर लगाना चाहिए और और इसके पत्ते अधिक से अधिक प्रयोग करने चाहिए।
इसके बारे में लोग बहुत कम जानते हैं यही कारण है कि इनके पत्तों का पाउडर पैकेट में भरकर ऊंचे दामों पर बेचते जाते हैं। इसके पाउडर का कैप्सूल भी लोग प्रयोग करते हैं क्योंकि उसमें भी बहुत अधिक पौष्टिक तत्व पाए जाते हैं। इसकी पत्तियों में का रस पीने से हैजा दस्त पेचिश पीलिया आदि रोग दूर हो जाते हैं, खून की सफाई हो जाती है वही संक्रमण से भी बचाया जा सकता है। यह पौधा शरीर के लिए बहुत पौष्टिक माना जाता है इसलिए इस पौधे को जरूर घर में उगाकर इसके लाभ उठाने चाहिए।















** होशियार सिंह लेखक कनीना, महेंद्रगढ़ हरियाणा**

Saturday, May 23, 2020


















 अर्जुन
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       (टेरमिनालिया अर्जुना)
भारत देश की समृद्ध भूमि
भरी हुई है जड़ी  बूटियों से
प्रयोग करते आए ऋषि मुनि
रोग भगाते थे आहुतियों से,
                         जहां पांडव का नाम अर्जुन
                        एक पेड़  भी  अर्जुन कहाता
                        भारतवर्ष में बहुत मिलता है
                       कई रोगों में खुशहाली लाता,
छाल गिरती रहती हर साल
ब्रुस जैसे लगते इस पर फूल
हरे खुरदरे लगते फिर फल
पहचानने में मत करना भूल,
                           इसके पत्तों पर पलता माथ
                           टसर बनाता काम आता है
                           हृदय रोगों में आता है काम
                          बुखार को यह दूर भगाता है,
घाव हो या हो फोड़ा, फुंसी
दर्द निवारक का यह है रूप
कई प्रकार के अमल मिलते
अचार बनाओ या फिर सूप,
                           त्वचा रोगों को दूर भगाता है
                           पेशाब नली  रोगों से  बचाए
                          सेक्स रोगों में यह रामबाण
                          मासिक धर्म में यह हंसाए,
पार्क, बगीचा हो या विरान
मिल जाए खड़ा अर्जुन वहां
औषधीय पौधा यह होता है
ढूंढ लो इसको मिलता जहां,
                        काष्ठकीय तना इसका होता
                       हरा भरा गर्मी में यह मिलता
                      गर्मी में मिलते बहुत से फूल
                      


वर्षा, आंधी में खूब हिलता।।
*****होशियार सिंह, लेखक, कनीना***

अर्जुन
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टर्मिनेलिया अर्जुन
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अर्जुन वृक्ष भारत का एक औषधीय वृक्ष है। इसे घवल ,कहुआ तथा सादड़ी नाम से भी जाना जाता है। यह वृक्ष एक बड़ा सदाबहार पेड़ है। करीब 60 फीट ऊंचा होता है तथा बिहार, मध्य प्रदेश में काफी पाया जाता है।
 इसकी छाल पेड़ से उतार लेने पर फिर पैदा हो जाती है। औषधियों में छाल का ही प्रयोग होता है।  एक वृक्ष में छाल तीन साल के चक्र में मिलती हैं। छाल गुलाबी रंग की होती है। यह वर्ष में एक बार स्वयं निकलकर नीचे गिर पड़ती है। स्वाद कसैला, तीखा होता है।
पत्ते अमरुद के पत्तों जैसे होते हैं या कहीं-कहीं नुकीले होते हैं। किनारे सरल तथा कहीं-कहीं सूक्ष्म दांतों वाले होते हैं। वे बसंत में नए आते हैं। फल वसंत में ही आते हैं जिनमें हल्की सी सुगंध भी होती है। फल लंबे अण्डाकार एवं धारियों वाले होते हैं जिन पर गर्मियों में फल लगते हैं तथा शीतकाल में पकते हैं। फल कच्ची अवस्था में हरे-पीले तथा पकने पर भूरे-लाल रंग के हो जाते हैं। फलों की गंध अरुचिकर व स्वाद कसैला होता है। फल ही अर्जुन का बीज है। अर्जुन वृक्ष का गोंद भूरा व पारदर्शक होता है।

अर्जुन जाति के कम से कम एक दर्जन प्रकार के वृक्ष पाए जाते हैं। अर्जुन की छाल को सुखाकर सूखे शीतल स्थान में चूर्ण रूप में बंद रखा जाता है।
अर्जुन एक औषधि है। हृदयरोग संबंधी सभी लक्षणों में विशेषकर क्रिया विकार जन्य तथा यांत्रिक गड़बड़ी के कारण उत्पन्न हुए विकारों में प्रयोग करते हैं।
अर्जुन की छाल में पाए जानेवाले मुख्य घटक हैं- बीटा साइटोस्टेराल, अर्जुनिक अम्ल तथा फ्रीडेलीन। अर्जुन की छाल में पाए जाने वाले अन्य घटक इस प्रकार टैनिन्स, लवण,सोडियम, मैग्नीशियम व अल्युमीनियम प्रमुख है। इस कैल्शियम सोडियम पक्ष की प्रचुरता के कारण ही यह हृदय की मांस पेशियों में सूक्ष्म स्तर पर कार्य कर पाता है।
अर्जुन से हृदय की पेशियों को बल मिलता है, स्पन्दन ठीक व सबल होता है तथा उसकी प्रति मिनट गति भी कम हो जाती है।  हृदय सशक्त होता है। यह खून में थक्का नहीं बनने देता।

अर्जुन के फलों को जहां लोग अचार, चटनी आदि बनाकर भी प्रयोग करते हैं वहीं इसकी छाल को चाय में डालकर भी लोग पीते हैं। अर्जुन में प्रमुख रूप से इसकी छाल काम में लाई जाती है। यदि हड्डी टूट जाए तो अर्जुन की छाल का पाउडर दूध के संग प्रयोग किया जाता है। जल जाए तो अर्जुन की छाल को पीसकर लगाया जाता है। दिल की बीमारियों में छाल को पीसकर दूध के साथ एक चम्मच पीना बहुत लाभकारी होता है। मुंह में छाले हो जाए तो अर्जुन की छाल को पीसकर नारियल के तेल में मिलाकर लगाया जाता है। यदि पेशाब धातु आ रही है तो अर्जुन काम में लाया जाता है। शरीर में अतिरिक्त ताकत देने के लिए इसे दूध, गुड़, चीनी के साथ प्रयोग करना चाहिए। पुरानी खांसी है तो अर्जुन छाल का सेवन करना लाभप्रद माना गया है। पेट दर्द के लिए छाल काम में लाई जाती है।
अगर पीलिया रोग हो तो छाल का प्रयोग करना चाहिए वही दांत दर्द में भी आराम देती है। अर्जुन की छाल शीतल हृदय को हितकारी, रुधिर विकार, कफ को नष्ट करने वाली होती है। सफेद बालों पर मेहंदी में मिलाकर अर्जुन की छाल को लगाने से बाल काले हो जाते हैं। बढ़ा हुआ कालस्ट्राल कम जाता है।
अर्जुन की छाल मोटापे को कम करती  है वही पेशाब की रुकावट को दूर करती है। छाल से सूजन ठीक होती है वही चोट लगने पर, मासिक धर्म में कान दर्द में, दांतो के लिए भी लाभप्रद है।  अर्जुन की छाल तासीर ठंडी होती है इसलिए गर्मियों में प्रयोग करना लाभप्रद है। जहां यह लाभप्रद है वहीं मधुमेह और बीपी की दवा प्रयोग कर रहे हैं उन्हें यह प्रयोग नहीं करनी चाहिए।
गर्भावस्था के समय इसका उपयोग नहीं करना चाहिए।
**होशियार सिंह, लेखक,कनीना,हरियाणा**

Friday, May 22, 2020














हींगोट
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हींगोरा
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हींगोटा
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बालनाइट्स एजिपियाका एल।
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हींगोटा जिसे ग्रामीण क्षेत्र में हींगोरा कहते हैं। एक पेड़ होता है जिसके गहरे हरे रंग के पत्ते होते हैं तथा भारी संख्या में कांटे पाए जाते हैं। इस पौधे को बालानिटासी के सदस्य के रूप में वर्गीकृत किया गया है अफ्रीका का मूल निवासी है जो अब विभिन्न देशों में पाया जाता है।
इस पौधे को रेगिस्तानी तिथि, सोप बेरी ट्री, सोप बेरी बुश, थ्रोन ट्री, इजिप्टियन मैरोबलन, इजिप्टियन बलसम कहा गया है। हरियाणा के  ग्रामीण क्षेत्रों में हींगोरा/हींगोटा कहा जाता है। हर प्रकार के मौसम में जीवित रहता है। राजस्थान और हरियाणा के रेतीले क्षेत्रों में सड़क के किनारे भी भारी मात्रा में मिलता है।
हींगोटा गर्मी,सर्दी एवं हर प्रकार के मौसम में बेहतर ढंग से जीवित रह सकता है। हींगोरा पेड़ की शाखाओं में लंबे, सीधे हरे रंग के कांटे पाए जाते हैं जो शुष्क वातावरण सहन करने को इंगित करता है। गहरे हरे रंग की संयुक्त पत्तियां पाई जाती हैं जिनका आकार बदलता रहता है। पीले-हरे पैच के साथ भूर रंग के छाल होते हैं।
पेड़ पर फूलों के गुच्छे होते हैं जो छोटे डंठल पर पैदा होते हैं। फूलों का रंग हरा-पीले रंग के होते हैं।  गोल, लंबे, फल होता है जिनका रंग हरा होता है जो पक जाने के बाद भूरे या पीले भूरे रंग के होते हैं जो अति कठोर होते हैं। पत्थरनुमा कठोर फलों में एक चिपचिपा पदार्थ भरा होता है।

मिस्र में हींगोला की हजारों वर्षों से की जा रही है। 1813 में डेनिस ने इसे बालानाइट्स नाम दिया।
  इसका पीला, एकल-बीज वाला अति कड़वा फल खाने योग्य है। इस पौधे के विभिन्न भाग उपयोग में लाएं जाते हैं। अकाल के समय पत्तियों को कच्चा या पकाया जाता है जिसमें अजवायन के बीज के साथ उबालकर शर्बत के साथ मिलाकर प्रयोग किया जाता है वहीं फूलों को खाया जा जाता है। यह सूखे समय में भी फल देता है ऐसे में इसे शुभ पौधा माना जाता है। फलों से मादक पदार्थ बनाए जाते हैं।

बीजों से तेल निकालने के बाद बचे हुए केक केक को पशु चारे के रूप में उपयोग किया जाता है जो पशुओं के कई रोगों को दूर कर सकता है। नर्सिंग माताओं द्वारा खाया जाता है और तेल का उपयोग सिरदर्द के लिए और स्तनपान कराने के लिए किया जाता है। मरुस्थलीय संक्रमण का उपचार भी किया जाता है। छाल के काढ़े का उपयोग कुछ देशों में तीर विष के लिए, एक गर्भपात और मारक के रूप में भी किया जाता है।
बीज में गैर-वाष्पशील तेल होता है।  पत्तियां, फल का गूदा, छाल और जड़ों में सैपोनिन्स पाया जाता है।
 लकड़ी का उपयोग फर्नीचर और टिकाऊ वस्तुओं जैसे उपकरण बनाने के लिए किया जाता है वहीं कम धुआं वाला कोयला बनाया जाता है। पेड़ जहां बाड़ का काम करता है वहीं सूखने पर भी बाड़ के रूप में किया जाता है। छाल से रेशे निकलते हैं। शाखाओं से निकलने वाले प्राकृतिक गम को गोंद के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। बीजों का उपयोग गहने और माला बनाने के लिए किया जाता है। टैटू भी बनाए जाते हैं।
  ग्रामीण क्षेत्रों में खांसी का रोग दूर करने के लिए काम में लेते हैं। जब खांसी हो जाती है तो इसके फल से गिरी निकालकर काम में लेते हैं। इसे इंगला या गरा नामों से जाना जाता है। इसका पौधा नींबू जैसे मिलते जुलते पत्तों जैसा होता है किंतु नींबू से बिल्कुल अलग होता है। पौधे विभिन्न प्रकार के विभिन्न रंगों के फूल आते विशेषकर सफेद रंग के फूल पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं। खांसी में बहुत उपयोगी है क्योंकि बिना नुकसान पहुंचाए कम करती है। फल की गिरी बादाम से बिल्कुल मिलती जुलती होता है किंतु इसके बीज से अनेकों प्रकार की दवाइयां बनाते हैं।
इसकी प्रकृति गरम होती है। इसका फल कड़वा होता है। इसका फल जहां आंखों की समस्या, कुत्ते के काटे के इलाज में काम में लाया जाता है। फोड़ा फुंसी के इलाज में काम में लेते हैं। इसके जड़ तथा इसके बीज को पीसकर फोड़े फुंसी पर लगाने से फोड़े फुंसी में आराम मिलता है। इसके फल को पीसकर आंखों पर काजल की भांति भी लोग लगाते हैं ताकि आंखों के रोगों में राहत मिल सके। इसके बीज को पेन किलर के रूप में काम में लाया जाता है। विशेष रूप से रेगिस्तानी क्षेत्रों में यह पौधा बहुत महत्वपूर्ण पौधा होता है।

हिंगोरा फल कच्चे एवं पक्के दोनों ही रूपों में खाई जाती है। इसका फल मिठाइयां बनाने में, शराब आदि के बनाने में, सूप बनाने में काम मिलाया जाता है। इसके पत्ते जहां सब्जी बनाने के काम में लाए जाते हैं वही फूल भी खाने के काम आते हैं। इसका तेल कुकिंग के काम में आया लाया जाता है। इसका तेल गर्म करने पर धुआं नहीं देता और फैटी एसिड से रहित है। इसके बीच में 50 प्रतिशत तक तेल पाया जाता है। यह जोड़ों के दर्द, पेट के कीड़े ,घाव, मलेरिया, दस्त, बदहजमी, डायरिया, पेट के दर्द, अस्थमा, बुखार आदि में काम में लाया जाता है। इसमें प्रोटीन, लिपिड, कार्बोहाइड्रेट अल्कलॉइड, साबुन जैसे पदार्थ पाए जाते हैं। इसकी जड़े कीटों को दूर भगाती है इसलिए इसकी जड़ मलेरिया दूर करने के काम में लाई जाती है। फल अमाशय के दर्द को तथा पेट फूलना आदि में काम में लाए जाते हैं। इसकी छाल हृदय की जलन पशुओं के पेट से कीड़े दूर करने के लिए भी छाल प्रयोग की जाती है। इसका गोंद लापसी में मिलाकर छाती के दर्द को दूर करता है।
गम इसी से प्राप्त होता है। फल में साबुन जैसा पदार्थ पाया जाता है जो गूंगे आदि को मारने के भी काम में लाया जाता है। इसकी लकड़ी बहू उपयोगी होती है। विभिन्न प्रकार के फर्नीचर आदि बनाने के काम में लाई जाती है। इससे चारकोल भी प्राप्त होता है जो बहुत महत्वपूर्ण पदार्थ है बगैर धमाके जलता है जो अधिक ऊर्जा उत्पन्न करता है। इसका पौधा विभिन्न प्रकार के मिट्टी कटाव को और रोकता है।
** होशियार सिंह लेखक, कनीना, महेंद्रगढ़, हरियाणा**


             हिंगोल, हिंगोटा, हिंगूल
            (बैलेनाइट इजिप्टियाका)

सेनेगल देश में प्रमुखता से
एक  झाड़ी-पेड़  मिलता है
डेजर्ट डेट के नाम से जाने
सर्दियों में फूल खिलता है,

                   हिंगन, हिंगोल, हिग्लिग
                  सोपबेरी, थार्न ट्री, हिगोटा
                    बैलेनाइट, इंगुडी, हिंगोरा
                   अंगारवृक्ष नाम इसका होता,

हरे कांटों से लदा हुआ है
कठोर फल कभी लगते है
हर प्रकार की भूमि में हो
जंगल में खड़े ये सजते हैं,

                         भूरे रंग का छिलका होता
                         छोटे-छोटे पत्ते फिर लगते
                        रस से भरे फल लगते फिर
                       अखरोट जैसे पीले सजते,

पुराने समय का साबुन यह
धोते थे वस्त्र इसके फल से
कितने ही रोगों में काम का
फल झाग देता जब मलते,

                        पेड़ बहुत ही उपयोगी होता
                         त्वक रोगों में फल काम का
                         कुकर खांसी को दूर करता
                         खड़ा लगता पेड़ बे दाम का,

गर्भधारण को दूर करता है
कैंसर में बीज काम आता है
घावों को पत्तों से धोते जन
कामला में भी काम आता है,

                           शुगर रोगों में बहुत उपयोगी
                           पेट दर्द को यह दूर भगाता
                           बुखार व दमा को दूर करता
                            बदहजमी, हैजा इससे डरता,

जीवाणुओं को मार डालता
पेट के कीड़ों को दूर भगाता
जलन पेट की दूर कर देता है
कितने ही रोगों में काम आता,

                            मलेरिया के मच्छरों को मारता
                            खनिज लवणों से यह भरा है
                             पूरे विश्व में ही पाया जाता है
                              गहरे हरे रंग का हरा भरा है,

ग्रामीण जन इसे हिंगोरा कहे
कहीं-कहीं पर खड़ा मिलता
औषधीय पौधा कहलाता है
आंधी बारिश में यह हिलता।

                  


***होशियार सिंह, लेखक, कनीना***