रुहेड़ा
(टेकोमेल्ला अनडुलेटा)
भारत-पाक में मिलने वाला
रंग बिरंगे फूल खिलते फूल
जन-जन को देता है औषधि
खुद गर्मी में फांकता है धूल,
सदाबहार सा पेड़ कहलाता
लाल,पीले,संतरी फूल आता
थार में थार डेजर्ट कहलाता
मारवाड़ में ये टीक कहलाता,
हनी ट्री, डेजर्ट टीक नाम हैं
कैर, जाट संग खड़ा मिलता
सख्त टिकाऊ लकड़ी इसकी
ग्रीष्म में इसके फूल खिलता,
फिनिसिंग को विख्यात लकड़ी
भेड़, बकरी इसकी पत्ती खाती
मिट्टी कटाव में अहं है भूमिका
ठंडी प्रकृति सबको ही सुहाती,
छाल है इसकी अति औषधीय
मूत्र विकारों में यह काम आती
प्लीहा, यकृत रोगों को दूर करे
फूल हेपेटाइटिस में काम आती,
बीज इसके बहुत उपयोगी होते
फोड़े फुंसी रोग को भी दूर भगाते
पेट -वायु विकार में ये काम आते
कान-आंख के रोगों में काम आते,
शरीर घावों को करते बीज से साफ
बीज ही सूजाक रोगों को दूर भगाते
रोग दूर कर रोगी को भी ये हंसाते
रुहेड़े को ग्रामीण जन पास लगाते,
रोहेड़ा, रोहिड़ा, रुहेड़ा कितने नाम
बना देता है किसान के बिगड़े काम
काट डाला किसानों ने खेतों से ही
रुहेड़ा जन के आता बहुत काम।।
******* होशियार सिंह, लेखक,कनीना***
श्रीआई
सिल्वर कोकसकोंब
(सेलोसिया अर्जेंटी)
किसान के खेतों में कभी
उगती है कुछ खरपतवार
सब्जियों में काम आती हैं
प्रयोग करो व्रत या त्योहार,
बाथू, चौलाई और श्रीआई
किसान ने कभी नहीं बचाई
धीरे-धीेरे ये लुप्त हो रही हैं
तरसेंगे फिर इन्हें लोग लुगाई,
हरे भरे पत्तों से युक्त सब्जी
खरीफ फसल में मिलती है
सफेद भुट्टे सा फूल खिलता
मदमस्त बाजरे में हिलती हैं,
गजब की सब्जी व साग बने
किसान के घर में खाया जाए
जब किसान खेतों से घर लौटे
तोड़ श्रीआई घर को ले लाए,
खून की कमी को करती पूरा
काट पीट इसकी भाजी बनाए
रायता दही में जब बन जाता है
अंगुली को चाट-चाटकर खाए,
कितने ही खनिज लवण मिलते
कितनी इससे मिलती विटामिन
मुफ्त की गुणकारी मिले सब्जी
जन की उम्र बढ़ जाए दिनोंदिन,
भूल गए क्यों ग्रामीण सब्जी को
कहां गए वो लोग इसे खाने वाले
आजकल की जहरीली सब्जी से
रोग बढ़ते जा रहे लाइलाज वाले,
कब जागेगा इंसान धरा वाला
कब तक यूं ही करेगा संहार
धरती मां ने जग ऋण उतारा
जग का धरा पर ऋण उधार।
***होशियार सिंह, लेखक, कनीना***
श्रीआई
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सिल्वर कोक्सकोंब
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सेलोसिया अर्जेटी
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श्रीआई एक शाक का नाम है जो सिल्वर कोक्सकोंब नाम से जाना जाता है। वास्तव में इस का वैज्ञानिक नाम सेलोसिया अर्जेटी है। यह किसी समय हरियाणा भारत के हरियाणा राज्य में बहुत अधिक होता था। अब धीरे.धीरे समाप्त होता जा रहा है। किसानों ने अपने पेट की भूख को शांत करने के लिए अधिक से अधिक पैदावार लेनी चाही। परिणाम स्वरूप उसने दवाओं का छिड़काव किया, भारी मात्रा में उर्वरक डालें जिसके चलते श्रीआई पूर्णता लुप्त होने के कगार पर पहुंच गई है। यह खरीफ फसल बतौर बाजरा, ग्वार, कपास आदि में भारी मात्रा में होती थी। इसकी बड़ी खूबी थी, गहरा हरे रंग का होती थी। पत्ते लंबे चौड़े होते थे तना इसका हरा होता था। तथा इस पर सफेद रंग के फूलों का गुच्छा आता था जिसमें काले रंग के गोल बीज निकलते थे। जो बहुत सुंदर लगते थे। लेकिन इस पौधे को देखकर लगता था कि वास्तव में यह बहुत स्वादिष्ट होगा क्योंकि इसका गहरा रंग मन को आकर्षित कर लेता था। खेतों में खरपतवार के रूप में पाया जाने वाला यह शाक पूर्णता समाप्त हो गया है।
श्रीआई सब्जी के काम आती है। जब कभी तीज त्योहार एवं व्रत के समय इसका प्रयोग करते करते थे। विभिन्न प्रकार की सब्जियां इससे बनाई जाती थी यहां तक कि खाटा का साग, भाजी बहुत महत्वपूर्ण होते थे, बहुत स्वादिष्ट बनते थे। इस के पराठे तो मानो बहुत अधिक रोचक लगते थे जिनके में खून की कमी होती थी वह कुछ ही दिनों में दूर हो जाती थी। इसके हरे भरे पत्तों में बहुत अधिक लोहा पाया जाता है। इसकी गजब की साग सब्जी बनती थी। बुजुर्ग आज भी इसको नहीं भुला पाये हैं क्योंकि खेतों की शान होती थी।
किसान बेशक अच्छी पैदावार ले रहे हो लेकिन इस शाक को नहीं भुला पाए हैं। दही में रायता बनाकर खाते थे तो उंगलियों को चाटते ही रह जाते थे। बहुत अधिक खनिज लवणों से भरपूर होती थी। यह उम्र बढ़ाने में सहायक थी। आज इसको खाने वाले तो दूर युवा पीढ़ी पहचानती भी नहीं। अगर लाकर रख दिया भी जाए तो युवा पीढ़ी इसे दूर फेंक देगी। यही कारण है कि लोग विशेषकर खून की कमी से रोग बढ़ते जा रहे हैं। यह एक ऐसा पौधा था जो पेट की विभिन्न बीमारियों को दूर करने के काम में लाया जाता था। पेट की जो भी बीमारी होती थी उन सभी में यह औषधि के रूप में काम में लाया जाता था और लोग इसे बहुत पसंद करते थे। आज बस इस पौधे की यादें रह गई हैं। आज अगर चाहे तो बारिश के बाद इक्का.दुक्का पौधा कहीं मिल सकता है। बुजुर्ग बताते हैं कि उनके जमाने में बहुत अधिक फलता फूलता था किंतु अब यह समाप्ति की ओर जा रहा है। यदि किसी में गुर्दे की अमाशय की या आंतों की समस्या होती थी इस पौधे को याद करते थे। इस पौधे जहां चेहरा लाल पड़ जाता था वहीं कार्यों में रूचि बढ़ जाती थी। इससे इंसान बहुत खुश रहता था।
कचरी
(कुकुमिस पुबिसेंस)
किसानों के खेतों में खुद
उगकर फैलती ही जाए
कई रंगों में फल मिले
कचरी फल वो कहलाए,
ताजा कचरी तरबूजे जैसी
खीरा की प्रकार कहलाए
हरी और पीली रंग में हो
खट्टी मिट्ठी कचरी कहलाए,
पूरे विश्व में मिले यह फल
पकी और सूखी काम आए
राजस्थान का बेहतर फल
जन-जन में पहचान बनाए,
ग्रामीण किसान खेतों से तोड़
अपने घर में लेकर आते हैं
विभिन्न प्रकार से प्रयोग करे
चटनी एवं सब्जी खूब बनाएं,
जब पककर गिरे इसे सुखाते
पाउडर पीसकर फिर बनाते
कितने रोगों में रामबाण पदार्थ
फोड़ फुंसी हो तो इसे लगाते,
उत्तेजक टानिक कचरी होती
विभिन्न नामों से जग में जाने
राजस्थान में कई पकवान बने
कचरी की चटनी को जग माने,
कचरी सूखा पाउडर बना ले
वो कचरी का पाउडर कहलाए
जब भी घर में सब्जी बनाए तो
कचरी पाउडर स्वाद को बढ़ाए,
पेट रोगों में औषधि कहलाती
खाने का जग में स्वाद बढ़ाती
सूखे को भी सहन कर लेती है
कचरी की नहीं खेती की जाती,
आमचूर का विकल्प बेहतर है
पकने पर सलाद के काम आए
प्रोटीन व खनिजों से भरी हुई है
बच्चे और बूढ़ों के मन को भाए,
टमाटर की जगह काम में लेते
गरीब जनों की बेहतर है सब्जी
होटलों में अब यह जा पहुंची
तोड़ डालती है पेट की कब्जी,
प्रकृति का अनमोल उपहार यह
मारवाड़ी व्यंजनों में होती मशहूर
शरीर में ठंडक देने वाली होती
शरीर की गर्मी को कर देती दूर,
बड़े काम की जंगली कचरी है
पक जाए तो ले आओ इसे घर
खूब मजे से पकाकर खाते रहो
नहीं अब किसी रोग का है डर।।
***होशियार सिंह, लेखक, कनीना***
खीप या खींप
(लेप्टाडेनिया पाइरोटेक्निका)
पुराने वक्त में खेतों में
मिलता था पौधा खीप
पशु खाते, रस्सी बुनते
चेचक में लेते थे लीप,
खुरसने से मिलता था
पत्ते अल्प नजर आते
झाड़ी बनकर जंगल में
ये सरीसृप को लुभाते,
जंगल में गुब्बारा चाहे
खीप कपड़े पर मलते
पीछे से जब फूंक लगे
हवा में गुब्बारे निकलते,
पशु रोग जब हो जाते
काट पीट इसे चराते थे
कितने ही पशु रोगों को
इस पौधे से ही हटाते थे,
वन में मिट्टी कटाव को
खीप बखूबी से रोकते थे
अनोखा उपहार वनों का
रक्तस्राव को ये रोकते थे,
आंख का लोशन बनता
चेचक रोगों में मलते थे
गुर्दे के रोग,पत्थरी,खांसी
कितने रोग ही टलते थे,
पेट दर्द, गठिया, गर्भपात
बांझपन, यौन रोग हटाए
सिरदर्द, पशु पेट घटाए
सब्जी बनाकर इसे खाए,
दंत रोगों में खीप काम का
कंटेनर इसके ही बनते हैं
पशुचारे के काम में आता
घर, छप्पर इसके बनते हैं,
कितने खीप रोग दूर करे
कितने ही काम का होता
देसी दवाएं घर पर बनाते
कितने के घाव यह धोता।
***होशियार सिंह, लेखक, कनीना***
हिंगोल, हिंगोटा, हिंगूल
(बैलेनाइट इजिप्टियाका)
सेनेगल देश में प्रमुखता से
एक झाड़ी-पेड़ मिलता है
डेजर्ट डेट के नाम से जाने
सर्दियों में फूल खिलता है,
हिंगन, हिंगोल, हिग्लिग
सोपबेरी, थार्न ट्री, हिगोटा
बैलेनाइट, इंगुडी, हिंगोरा
अंगारवृक्ष नाम इसका होता,
हरे कांटों से लदा हुआ है
कठोर फल कभी लगते है
हर प्रकार की भूमि में हो
जंगल में खड़े ये सजते हैं,
भूरे रंग का छिलका होता
छोटे-छोटे पत्ते फिर लगते
रस से भरे फल लगते फिर
अखरोट जैसे पीले सजते,
पुराने समय का साबुन यह
धोते थे वस्त्र इसके फल से
कितने ही रोगों में काम का
फल झाग देता जब मलते,
पेड़ बहुत ही उपयोगी होता
त्वक रोगों में फल काम का
कुकर खांसी को दूर करता
खड़ा लगता पेड़ बे दाम का,
गर्भधारण को दूर करता है
कैंसर में बीज काम आता है
घावों को पत्तों से धोते जन
कामला में भी काम आता है,
शुगर रोगों में बहुत उपयोगी
पेट दर्द को यह दूर भगाता
बुखार व दमा को दूर करता
बदहजमी, हैजा इससे डरता,
जीवाणुओं को मार डालता
पेट के कीड़ों को दूर भगाता
जलन पेट की दूर कर देता है
कितने ही रोगों में काम आता,
मलेरिया के मच्छरों को मारता
खनिज लवणों से यह भरा है
पूरे विश्व में ही पाया जाता है
गहरे हरे रंग का हरा भरा है,
ग्रामीण जन इसे हिंगोरा कहे
कहीं-कहीं पर खड़ा मिलता
औषधीय पौधा कहलाता है
आंधी बारिश में यह हिलता।
***होशियार सिंह, लेखक, कनीना***
जंगली करेला
(मोमोर्डिका डायोइका)
जब बारिश हो जाती है
नई-नई बहार आती है
जंगल में जड़ी बूटी उग
मन को बहुत लुभाती हैं,
कहीं बाड़ करेला उगता
फूलों में खुशबू आती है
बिट्टर मेलन, बिट्टर गार्ड
करेले की आहट लाती है,
हरी भरी एक बेल फैले
बाड़, झाड़ पर चढ़ जाती
नर-मादा फूल अलग हो
सुंदर फलों से लद जाती,
कुछ दिन में फल पकते
बीज बनते लाल रंग के
सब्जी फल की बनाकर
खाए खिले बाछे मन के,
फल, पत्ते, जड़ और तना
जन घर में तोड़कर लाते
सदियों से जग में प्रसिद्ध
औषधियों में काम आते,
खून रोकना हो तो इससे
बवासीर का रोग दूर हो
शुगर रोगी प्रयोग करे तो
यह रोग भी जल्द चूर हो,
पेट रोगों में रामबाण यह
कई पकवान बनाए जाते
लेकिन पके हुए फल खा
हैजा, उल्टी भी लग जाते,
बच्चों के रोग दूर करते हैं
ग्रामीण जन बाड़ करेले से
जीव जंतुओं का आहार है
धन कमाते गरीब करेले से,
बहु उपयोगी जंगली करेला
बन जाते कई बिगड़े काम
इसलिए हर जगह प्रसिद्ध
बिट्टर स्कवेस इसका नाम।
***होशियार सिंह, लेखक, कनीना*****
अर्जुन
(टेरमिनालिया अर्जुना)
भारत देश की समृद्ध भूमि
भरी हुई है जड़ी बूटियों से
प्रयोग करते आए ऋषि मुनि
रोग भगाते थे आहुतियों से,
जहां पांडव का नाम अर्जुन
एक पेड़ भी अर्जुन कहाता
भारतवर्ष में बहुत मिलता है
कई रोगों में खुशहाली लाता,
छाल गिरती रहती हर साल
ब्रुस जैसे लगते इस पर फूल
हरे खुरदरे लगते फिर फल
पहचानने में मत करना भूल,
इसके पत्तों पर पलता माथ
टसर बनाता काम आता है
हृदय रोगों में आता है काम
बुखार को यह दूर भगाता है,
घाव हो या हो फोड़ा, फुंसी
दर्द निवारक का यह है रूप
कई प्रकार के अमल मिलते
अचार बनाओ या फिर सूप,
त्वचा रोगों को दूर भगाता है
पेशाब नली रोगों से बचाए
सेक्स रोगों में यह रामबाण
मासिक धर्म में यह हंसाए,
पार्क, बगीचा हो या विरान
मिल जाए खड़ा अर्जुन वहां
औषधीय पौधा यह होता है
ढूंढ लो इसको मिलता जहां,
काष्ठकीय तना इसका होता
हरा भरा गर्मी में यह मिलता
गर्मी में मिलते बहुत से फूल
वर्षा, आंधी में खूब हिलता।।
*****होशियार सिंह, लेखक, कनीना***