बेलपत्र
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बिल्व, बेल
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ऐग्ले मार्मेलोस
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पीड़ा निवारक, श्री फल, सदाफल
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बेल
धार्मिक एवं औषधीय पौधा है जिसे बिल्व, बेल या बेलपत्र आदि नामों से जाना
जाता है। भारत में होने वाला एक फलदार पेड़ है। इसे रोगों को नष्ट करने की
क्षमता के कारण बेलपत्र को बिल्व कहा जाता है। फल का गूदा तथा सूखा गूदा
(बेलगिरी)दोनों लाभकारी हैं।
बेल के वृक्ष भारत ही नहीं अपितु कई देशों में में उगते हैं। इसकी खेती अति लाभप्रद साबित हो रही है। किसान उगाकर लाभ कमा रहे हैं।
धार्मिक
दृष्टि से भी बेलपत्र अति महत्वपूर्ण होने के कारण इसे शिवालयों के पास
लगाया जाता है। हिन्दू धर्म में इसे भगवान शिव का रूप ही माना जाता है व
मान्यता है कि इसके मूल में महादेव का वास है तथा इनके तीन पत्तों को जो एक
साथ होते हैं जिनको त्रिदेव का रूप मानते हैं। इसके पांच पत्ते भी पाए
जाते है। यह एकबीजपत्री पौधा है जिस पर कांटे पाए जाते हैं। गर्मियों में
पत्ते गिरकर नए पुष्प आ जाते हैं। बेल के फूल हरे एवं सफेद रंग के होते हैं
जिनमें भीनी भीनी गंध आती है।
बेल का फल दो किलो तक होता है। फल
पर पीले/हरे रंग का खोल कठोर एवं चिकना होता है। पकने पर हरे से सुनहरे
पीले रंग का हो जाता है। फल में मधुर रेशेयुक्त सुगंधित गूदा निकलता है
जिसमें अनेकों छोटे, बड़े कई बीज होते हैं। यह दो प्रकार का होता है जिनमें
छोटे तथा बड़े आकार के। छोटे फलों को जंगली कहा जाता है। जंगली पौधे में
देखने में आता है कि अधिक कांटे होते हैं। बेल को तोडऩे पर कई खंड पाए जाते
हैं जिनमें बीज भरे होते हैं।
बेल
का फल-वात नाशक मानते हैं। इसका फल, चूर्ण, पत्तों का रस सभी औषधीय गुण
रखते हैं। बेलपत्र को को पुरानी पेचिश, दस्तों और बवासीर में बहुत अधिक
लाभकारी मानते हैं। यह पेट एवं आंतों के रोगों में लाभकारी पाया है। यह भूख
को बढ़ाता है।
बेल फल का गूदा वाशिंग पाउडर का काम करता है जिससे कपड़े
धोए जा सकता है। यह चूने के प्लास्टर में तथा चित्रकार अपने जल रंग मे
मिलाते हैं। इसमें पेक्टिन, शर्करा, टैनिन्स,मार्मेलोसिन नामक एक रसायन
पाया जाता है। इसके बीजों में पीले रंग की तीखा तेल रेचक होता है। बिल्व
पत्र में एक हरा-पीला तेल, इगेलिन भी पाए गए हैं। बेलपत्र सिर्फ पूजा मात्र
का ही एक साधन नहीं है, बल्कि आपके स्वास्थ्य के लिए भी बेहद लाभकारी है।
बुखार
होने पर बेल की पत्तियों के काढ़े का सेवन करते है। धुमक्खी, भिरड़, ततैया
के काटने पर बेलपत्र का रस लगाने से राहत मिलती है। हृदय रोगियों के लिए
बेलपत्र का काढ़ा बनाकर पीने से हृदय मजबूत होता है और हार्ट अटैक का खतरा
कम होता है। श्वास रोगियों के लिए पत्तियों का रस पीने से लाभ होता है।
शरीर में गर्मी बढऩे पर या मुंह में गर्मी के कारण यदि छाले हो जाएं, तो
बेल की पत्तियों को मुंह में रखकर चबाने से लाभ मिलता है।
बवासीर,
खूनी बवासीर में बेल की जड़ का गूदा पीसकर बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर
उसका चूर्ण लेने से लाभ मिलता है। सर्दी, जुकाम और बुखार की समस्याएं अधिक
होती हैं। ऐसे में बेलपत्र के रस में शहद मिलाकर पीना चाहिए वहीं ज्वर हो
जाने पर इसके पेस्ट की गोलियां बनाकर खाई जाती हैं। पेट या आंतों में कीड़े
होना या फिर बच्चे में दस्त लगने की समस्या हो, बेलपत्र का रस पिलाने से
काफी लाभ होता है। इसके हर भाग का इस्तेमाल सेहत बनाने और सौंदर्य निखारने
के लिए किया जा सकता है।. फल बेहद कठोर होता है लेकिन अंदर का
हिस्सा मुलायम, गूदेदार और बीजों से युक्त होता है। पत्थर की भांति फल कठोर
होने के कारण इसे कई बार बेल पत्थर भी कहा जाता है। पुराणों के अनुसार
मंदार पर्वत पर माता पार्वती के पसीने की बूंदे गिरने से बेल के पेड़ की
उत्पत्ति हुई। यह पेड़ सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न कर आसपास की नकारात्मक
ऊर्जा को दूर करता है।
बेल
के फल का जीवनकाल लंबा होता है तथा पेड़ से टूटने के कई दिन बाद भी इसका
इस्तेमाल किया जा सकता है। यह कई स्वादिष्ट व्यंजनों में भी प्रमुखता से
इस्तेमाल होता है इसके फल में प्रोटीन, बीटा-कैरोटीन, थायमीन, राइबोफ्लेविन
और विटामिन सी पाया जाता है। दिल से जुड़ी बीमारियों से बचाव में सहायक
है। यह ब्लड शुगर को नियंत्रित करने में सहायक होता है।गैस, कब्ज की समस्या
में राहत देता है। कोलस्ट्राल स्तर को नियंत्रित रखने में मददगार साबित
होता है। दस्त और डायरिया की समस्या में भी फायदेमंद है।
बेल के रस को दस्त और डायरिया में बहुत फायदेमंद माना गया है। बेल एक ऐसा पेड़ है जिसके हर हिस्से का इस्तेमाल होता है।
नियमित रूप से बेल का रस पीने से गैस, कब्ज और अपच की समस्या में आराम
मिलता है। चूर्ण आदि औषधीय प्रयोग में बेल का कच्चा फल, मुरब्बे के लिए
अधपक्का फल और शर्बत के लिए पका फल काम में लाया जाता है।
गर्मी एवं पेट के रोगों से मुक्ति प्रदान करने वाला फल है। बेलपत्र का
कच्चा फल रक्त स्तंभक, पक्का फल मधुर और मृदु रेचक तथा पत्तों का रस घाव
ठीक करने, वेदना दूर करने, ज्वर नष्ट करने, जुकाम और श्वास रोग मिटाने तथा
मूत्र में शर्करा कम करने वाला होता है। इसकी छाल और जड़ घाव, कफ, ज्वर,
गर्भाश्य का घाव, नाड़ी अनियमितता, हृदयरोग आदि दूर करने में सहायक होती
है।
बिल्वादि चूर्ण, बिल्व तेल, बिल्वादि घृत, बृहद गंगाधर चूण आदि
औषधियों में प्रयुक्त होता है। बेल के फलों का अधिक सेवन बवासीर के रोगियों
के लिए हानिकारक होता है। इसके अतिरिक्त गूदे में बीज दोहरी झिल्ली के बीच
होते हैं, जिसमें लेसदार द्रव होता है। इससे पचने में आसान, भूख बढ़ाने
वाला, चुस्ती देने वाला शर्बत है। अजीर्ण में बेल की पत्तियों के रस,काली
मिर्च और सेंधा नमक मिलाकर पिलाने से राहत मिलती है। आँखें दुखने पर
पत्तों का रस डालने से दुखती आंखों की पीड़ा, चुभन, शूल ठीक होकर, नेत्र
ज्योति बढ़ती है।
जल जाने पर बिल्व चूर्ण तेल में या बेल का
पक्का गूदा साफ करके भी लेपा जा सकता है। पाचन तंत्र में खराब होने पर रोगी
को बेलगिरी और आम की गुठली की गिरी बराबर मात्रा में दी जाती है। कब्ज से
पेट-सीने में जलन इसका शर्बत लाभप्रद है वहीं चेहरे पर ओज आएगा।
छाती
में जमे कफ दूर करता है। दमा के कफ को निकालता है। यह मूत्र और वीर्य दोष
नष्ट होते हैं। ल्युकोरिया में बेलगिरी लाभकारी है वहीं पीलिया में बेल
की कोपल लाभकारी है। मुंह के छाले, रक्त शुद्धि के लिए, सिर दर्द में,
पुराना सिर दर्द दूर करने में सहायक है वहीं अन्दरूनी चोट में बेल पत्रों
को पीस कर लगाने से लाभ मिलता है।
बेल के पत्तों से जनसंख्या नियंत्रण , कैंसर और लीवर के लिए भी फायदेमंद है।
गर्मी
के मौसम में मिलने वाला बेल गर्मी से राहत देने के साथ ही कई स्वास्थ्य
समस्या से भी निजात दिलाता है। अगर आप हर रोज बेल का शरबत पीते हैं तो आप
हमेशा निरोग बने रहेंगे।
मधुमेह रोगियों के लिए बेल फल बहुत लाभदायक है।
बेल की पत्तियों को पीसकर उसके रस का दिन में दो बार सेवन करने से
डायबिटीज की बीमारी में काफी राहत मिलती है। कच्चे फल का गूदा सफेद दाग
बीमारी का प्रभावकारी इलाज करता है। इससे एनीमिया, आंख और कान के रोग भी
दूर होते हैं। पुराने समय में कच्चे बेल के गूदे को हल्दी और घी में मिलाकर
टूटी हुई हड्डी पर लगाते थे। इसमें एंटीआक्सीडेंट्स पा जाते हैं। यह वायरस
व फंगल रोधी गुण रखता है वहीं विटामिन सी का अच्छा स्रोत है। पके हुए फल
के रस से दिल की बीमारियां दूर रहती हैं।
यह खून की कमी को दूर
करता है। जी मिचलाने में बेल के गूदे को पानी में मथ कर प्रयोग करते हैं।
गर्मियों में लू लगने पर बेल के ताजे पत्तों को पीसकर पैरों पर लगाने से
लाभ मिलता है। पका हुआ बेल मधुर, रुचिकर, पाचक तथा शीतल फल है। बेलफल बेहद
पौष्टिक और कई बीमारियों की अचूक औषधि है।
बेल के फल में नमी, वसा,प्रोटीन, रुक्षांस, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, फास्फोरस, आयरन,विटामिन पाए जाते हैं।
पेट
विकारों में बेल का फल रामबाण दवा है। वैसे भी अधिकांश रोगों की जड़ उदर
विकार ही है। बेल के फल के नियमित सेवन से कब्ज जड़ से समाप्त हो जाती है।
कब्ज के रोगियों को इसके शर्बत का नियमित सेवन करना चाहिए। बेल का पका हुआ
फल उदर की स्वच्छता के अलावा आंतों को साफ कर उन्हें ताकत देता है।
बेल
के पत्ते में वह प्राकृतिक गुण मौजूद होते हैं जो हमारे पेट के लिए बहुत
लाभदायक होते हैं इनका रोज़ सेवन करने से हमारे पेट से जुड़ी सभी समस्याएं
दूर रहती हैं। चाहिए। पत्तों को अच्छी तरह धो लेना चाहिए फिर दांतों से
चबाना चाहिए ताकि इसका रस अच्छी तरह से निकल आए और अं














त में इसे खा लेना चाहिए।
बेल
के पत्तों का सेवन करने के कुछ समय बाद ही दांत अच्छी तरह साफ करने चाहिए
क्योंकि बेल के पत्तों में जो औषधीय गुण होते किंतु दांतों को काला करता
है।
**होशियार सिंह, लेखक,कनीना,हरियाणा**
गर्मियों में का बेल पत्र प्रयोग
पेट की सभी बीमारियों में रामबाण औषधि है। बेल पत्र के पत्ते जहां शिव
भोले को अर्पित किए जाते हैं वहीं शूगर की बीमारी में इसके पत्ते प्रयोग
किए जाते हैं। बदहजमी, पीलिया, आंतों की सफाई एवं कई अन्य पेट संबंधित
बीमारियों में गर्मी के समय जरूर प्रयोग करना चाहिए। कनीना जिला महेंद्रगढ़
हरियाणा में एक फार्म पर दो-दो किग्रा तक के बेल पत्र आकर्षण
का विषय बने हुए हैं।
शिव शेखरण
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धतूरा
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धतूरा स्ट्रामोनियम
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हेल्स बेल, मून
फ्लोवर, डेविल्स स्टंप्ड, डेविलस विड, स्टिंग वीड, लोकोवीड, फाल्स कैस्टर
ऑयल प्लांट, डेविल्स कुकुंबर ,थ्रोन एप्पलधतूरा
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धतूरा
एक मीटर तक ऊंचा एक पौधा होता है। यह दो रूपों में प्रयोग किया जाता है
जिसमें एक काला तो दूसरा सफेद होता है। काले धतूरे का फूल नीली धारियों
वाला होता है। हिन्दू लोग धतूरे को शिव शंकर जी पर अर्पित करते हैं। इसे
कनक और उन्मत्त नामों से संबोधित किया जाता है। यद्यपि आयुर्वेद में इसे विष वर्ग में रखा गया है किंतु यह रोगों इलाज में काम में लाया जाता है।
यह द्विबीजपत्री पौधा होता है जिसे वैज्ञानिक भाषा में धतूरा स्ट्रामोनियम नाम से जाना जाता है।
धतूरे
के पत्तों का धुआं दमा शांत करने, पत्तों का अर्क कान में डालने से आंख का
दुखना बंद हो जाता है। धतूरे की जड़ सूंघे तो मृगी रोग,फल को उड़द संग ताप
रोग दूर करने पुरुष तत्व को बढ़ाने,कोमल पत्तों को तेल से चुपड़कर
और आग पर सेंक बच्चे की सर्दी दूर करने, फोड़ा ठीक करने, बवासीर और भगन्दर
रोग ठीक करने, प्रसूति रोग व गठिया रोग में काम आता है।
धतूरे में अट्रोपिन पाया जाता है जो परंपरागत दवाओं में काम आता है। धतूरे
को धार्मिक पौधा माना जाता है इसलिए इसे शिव भोले पर अर्पित किया जाता है।
संत साधु संत इसकी चिलम बनाकर पीते हैं जो बीज द्वारा उगाया
जा सकता है। इस पौधे के फल कांटेदार होते हैं। फलों में काले रंग के बीज
पाए जाते हैं जिनको उगा कर उनसे पौधे तैयार किया जा सकता है। चीन के लोग
धतूरे द्वारा बेहोश करके सर्जरी करते हैं।
धतूरा गठिया, बुखार, गर्भधारण, स्तनों की सूजन, यौन
शक्ति, पागलपन, बाल रोग, सिरदर्द, नेत्र रोग, सूजन, सिर की जुएं, कान के
रोग दूर करने के काम आता है वही बिच्छू जहर में भी काम में लाया जाता है।
धतूरे
की रस को तिल के तेल में पकाकर गठिया रोग में, धतूरे के बीजों की राख
बुखार में, धतूरे के फलों के चूर्ण शहद में मिलाकर गर्भधारण में, स्तनों की
सूजन को दूर करने
में पट्टे, यौन शक्ति बढ़ाने के लिए बीज अकर्करा और लोंग में मिला कर दिया
जाता है वहीं उन्माद में काले रंग का धतूरा काम में लाया जाता है। बाल रोग
में धतूरे की पत्तियां, सिर दर्द में धतूरे के बीज, नेत्र रोग में ताजा
पत्तों का रस काम आता है। सिर के रोगों को दूर करने में भी यह काम में लाया जाता है, सिर की जुएं, कान के रोग आदि के इलाज में काम में लाया जाता है।
यह वास्तव में विदेशी पौधा है जो पूरे भारत में फैला हुआ
है। धतूरे में पत्ते और बीज में कई गुण पाए जाते हैं। धतूरे का अधिक
मात्रा में सेवन जहर के समान होता है। शरीर को सुन्न कर देता है, सिर में
दर्द पैदा करता है, पागलपन, बेहोशी आदि पैदा करके व्यक्ति की मौत भी ला सकता है।
धतूरा
गर्म प्रकृति का होता है। शरीर में गर्मी गैस को बढ़ाता है, बुखार और कोढ़
को नष्ट करता है। धतूरा की पांच प्रमुख प्रजातियों मिलता है जिनमें सफेद,
काला, नीला, पीला और लाल फूल लगते हैं। यह भी माना जाता है कि धतूरे के
बगैर शिव शंकर की पूजा अधूरी होती है। यह नाक की बीमारी, बिच्छू के काटने
पर, गंजापन आने पर पत्तों का रस लगाकर, हाथ पैरों में अधिक पसीना
आने पर बीज की राख, दांत दर्द में बीजों के पानी, कुत्ते के काटने पर इसके
पत्तों के रस में मिर्च मिलाकर, अंडकोष की सूजन पत्तों द्वारा, फेफड़ों की
सूजन पत्तों द्वारा, खांसी में पत्ते, अफारा, नपुंसकता को
दूर करने, पुरुष रोग दूर करने, गर्भपात को रोकने, कमर दर्द, बहरापन,
स्तनों का कठोर होना, कील कांटा चुभने पर धतूरे को गुड़ में मिलाकर दिया
जाता है, वही टेटनस व पेट में दर्द होने पर, हाथ पैर की अकडऩ, लिंग दोष,
सिर का दर्द, नाड़ी का दर्द, हैजा आदि में भी काम में लाया जाता है। इसके
पत्ते और बीज विषैले होते हैं। यदि धतूरे का जहर शरीर में चढ़ गया है तो
पलाश या ढाक के फूल खिलाना चाहिए। कपास के फूल भी धतूरे के जहर को दूर करने
के काम आते हैं।
अंग्रेजी में इसे जिमसनविड नाम से जाना जाता है जो
नाइटशेड फैमिली से संबंध रखता है। इसकी उत्पत्ति अमेरिका से मानी जाती है।
इसमें अल कोलाइड पाए जाते हैं। यह वार्षिक पौधा होता है इसके तने छोटे
होते हैं। यहां तक कि हरी रंग धारियां होते हैं। इस पौधे को हेल्स बेल, मून
फ्लोवर, डेविल्स स्टंप्ड, डेविलस विड, स्टिंग वीड, लोकोवीड, फाल्स कैस्टर
ऑयल प्लांट, डेविल्स कुकुंबर ,थ्रोन एप्पल नामों से जाना जाता है। यह कुल मिलाकर बहुत औषधीय पौधा होता है।
**होशियार सिंह लेखक, कनीना, महेंद्रगढ़ हरियाणा**
धतूरा
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गहरे हरे रंग का पौधा
धतूरा जग में कहलाए
दतुरा वंश इसका होता
स्ट्रामोनियम जन सुहाए,
गहरे हरे रंग का एक पौधा
धतूरा जग में वो कहलाए
दतूरा वंश इसका ही होता
स्ट्रामोनियम जन सुहाए,
अमेरिका में हुई उत्पत्ति
लिनियस ने दे दिया नाम
एल्कलोइड्स से परिपूर्ण
जहरीला करे काम तमाम,
दवा बनती धतूरे की कई
बेहोशी के भी काम आए
पीए अगर अधिक इसको
मानव दिग्भ्रमित सो जाए,
पार्किनसन रोग लगता तो
धतूरे की दवा काम आए
अस्थमा मरीज परेशान हो
धतूरा की दवा मरीज खाए,
आस्था से जुड़ा हुआ धतूरा
शिव शेखरण भी कहलाए
शिव भोले पर करते अर्पित
मन की मुरादें पूरी जन पाए,
जंगलों में खड़ा होता धतूरा
जंगली धतूरा वो कहलाता
घरों में गमले में खड़ा मिले
शुभ कर्म का फल वो पाता,
विशेष गेंद सा इसका फल
काले बीज खूब मिल जाए
नजर का चक्र जब कभी हो
कहते हैं इसी से मुक्ति पाए।
****होशियार सिंह, लेखक, कनीना****
गोगा
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(अचिरांथस एस्पेरा)
गोगा पर्व पर यह पूजा जाता
अपमार्ग यह शाक कहलाता
डविल्स होर्सहीप कहते हैं
खरपतवार के रूप में आता,
जंगल, खेत व पुराने घरों में
खड़ा मिलता बहुत अधिक
21 पत्ते गणेश पूजा के काम
हृदय के रोगों को करे ठीक,
सैकड़ों रोगों में काम आता है
गुर्दे की पथरी निकाल देता है
नारी रोगों में बहुत उपयोगी है
उल्टे कांटों से पकड़ लेता है,
हरे भरे पत्ते से लदा मिलता है
सर्प काटने पर काम में आता
एक वर्षीय हर्ब यह कहलाता
घर आंगन में सभी को सुहाता,
किसी प्रकार की ब्लीडिंग हो
कारगर औषधि का काम करे
ग्रामीण क्षेत्रों में गोगा कहलाए
देखकर इसको जन लगते डरे।
***होशियार सिंह, लेखक, कनीना***
अपामार्ग(गोगा)
अचिरांथिस अस्पेरा
बरसात का मौसम जब आए
चिरचिटा, लटजीरा उग जाए
गणेश पूजा में यह काम आए
भारत में ये खरपतवार कहाए,
ग्रामीण क्षेत्र में गोगा कहलाता
विभिन्न रोगों में काम ये आता
स्त्रि रोगों में रामबाण कहलाता
ओला कांटा इस पर ही आता,
कपड़ों के कांटा जब चिपटता
दूर दराज तक यह पहुंच जाता
जड़ व पत्ता बहुत काम आता
जीव जंतुओं को बहुत लुभाता,
महिला के गर्भपात में बढ़ाता
जब महिला बच्चा जन जाती
कितनी ही बीमारी लग जाती
ब्लीडिंग को शाक रोक पाती,
बहु मासिक धर्म , ल्युकोरिया
कितने ही रोगों को दूर भगाता
त्वचा रोग हो या कुत्ता काटता
झटपट औषध आराम दिलाता,
सर्दी, खांसी या हो फिर ड्रोप्सी
अंग जले या त्वचा के हो रोग
गर्भ पूर्व समय या गर्भ के बाद
रोग लगे तो करे इसका उपभोग,
किसान इसे उखाड़कर फेंकता
आम आदमी है अनभिज्ञ इससे
कोई हो बीमारी तो लाओ घर
दवाएं बनती जड़, पत्ता इसके,
बहु उपयोगी शाक ये कहलाए
रोते हुए मरीज को यह हंसाए
रोगों को दूर करता लाए बहार
पेट रोगों को जल्द दूर भगाए।।
***होशियार सिंह, लेखक, कनीना**
लटजीरा
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अपामार्ग
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चिरचिटा
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अचिरेंथस एस्पेरा
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ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत औषधियां और वनस्पतियां पाई जाती है जिनका लोगों को ज्ञान न होने से उनका सदुपयोग नहीं हो पा रहा है किंतु यदि बाजार में किसी पंसारी की दुकान से महंगे दामों पर खरीदनी पड़ती है। ऐसी ही एक वनस्पति अपामार्ग है जिसे लटजीरा या चिरचिटा नाम से भी जाना जाता है।
यह एक ऐसी औषधि है जिसका विशाल औषधीय गुणों के कारण गोगा पर्व पर भी ग्रामीण क्षेत्रों में पूजा की जाती हैं। इसकी पूजा करने के पीछे भी यही कारण है कि यह घरों में एक बहु औषधीय पौधा है। यदि देखा जाए तो इसके औषधीय गुणों को हम कभी नहीं भुला सकते। वास्तव में फल कांटे की भांति काम करते हैं जो उल्टे होते हैं इसलिए लोग अक्सर ओला कांटा कह देते हैं।
जब कभी इन पौधों के बीच से गुजरना होता है और पौधे पर फल पके हुये हो तो तो यह कपड़ों के भारी मात्रा में चिपक जाते हैं। लेकिन ध्यान रहे भू्रट और मसखरा अलग पौधे है जबकि लटजीरा अलग पौधा है।
यह एक शाक होता है अक्सर जंगलों ,बंजर भूमि पर पर्याप्त संख्या में मिलता है।
यह गोल पत्तों वाला होता है। तने पर नीचे चौड़े पत्ते होते हैं तथा ऊपर के पत्ते छोटे होते चले जाते हैं। उसके ऊपर के लंबा डंठल बनता है जिस पर फूल व फल लगते हैं। फल के कठोर होते हैं इनका रंग प्रारंभ में गुलाबी लाल रंग होता है।
अपामार्ग बहुत प्रसिद्ध औषधीय पौधा होता है जो वर्षा ऋतु में बीजों से अंकुरित होता है तथा शीत ऋतु आने पर गुलाबी रंग के फूल आते हैं और इसके बीज ऐसे लगते हैं जैसे चावल हो। सर्दियों में के सभी भाग जड़, बीज, फूल, पत्ते, तना और मूल इकट्ठे कर लिए जाते हैं। उन्हें छाया में सुखाकर उन्हें वर्ष भर प्रयोग करते हैं। इसे वज्रदंती भी कहते हैं क्योंकि दातुन करने से दांत एवं सुंदर चमक वाले बन जाते हैं। विषैले कीट काट जाते हैं तो उस समय इसके रस को उबले हुये तेल में कीट काटने वाले स्थल पर लगाया जाता है जिससे लाभ होता है।
गोगा में अनेकों रासायनिक पदार्थ पाए जाते हैं जिनमें से लिनोनीन, ओलियानोलिक अमल आदि प्रमुख हैं। जहां पुराने समय से इस पौधे का रस दीवार के प्लास्टर में मिलाकर प्रयोग किया जाता रहा है माना जाता रहा है ताकि किसी प्रकार के रोगाणु आदि घर में प्रवेश नहीं करते वहीं सुंदरता बढ़ाता हे। विभिन्न पर्वों पर किसकी पूजा की जाती है। विशेषकर गणेश चतुर्थी पर इसके पत्तों द्वारा पूजन किया जाता है। कई देशों में इसका उपयोग किया जाता है।
कुत्ते के काटने से हाइड्रोफोबिया रोग हो जाता है उस समय यह काम आता है वहीं सांप/ बिच्छू आदि काटने पर विष का निवारण करने में भी काम में लेते हैं। नेत्र रोग, त्वचा के रोग में फूलों को चीनी में घिस कर गोलियां बनाई जाती है। पत्तियों का रस बिच्छू के काटने पर कारगर माना जाता है। पौधे की राख से मिलने वाले पोटाश से कपड़े धोने के भी काम लिया जाता है, लकवा के समय यह बहुत काम आता है। प्रसूति स्त्री में, गर्भपात, प्रसूति के समय रक्त स्राव के उपचार में बहुत कारगर होता है जिसमें कई क्षेत्रों में प्रयोग किया जाता है। मलेरिया के लक्षणों को कम करने में औषधि के रूप में इसका उपयोग किया जाता है।
लटजीरा वैसे तो अनेक रोगों में काम आता है लेकिन खांसी, दमा रोगों के वक्त कारगर माना जाता है। लटजीरा वास्तव में चौलाई कुल का पौधा है जिसे अपामार्ग नाम से जाना जाता है। अपामार्ग का अर्थ होता है जो रोगों को संशोधित करने वाला। यह बढ़ी हुई भूख को शांत करने के काम आता है। यह एक दिव्य पौधा माना जाता है। इसकी लंबाई कोई अधिक नहीं होती, मुश्किल से 2 फुट के करीब हो जाती है। आंधा सीसी, नेत्र रोग, उदर विकारों में, रक्त शोधन, बुखार में काम आता है। उसकी जड़ को भी लोग चेचक होने पर चेचक के दानों को साफ करने के लिए जड़ को पीसकर लगाते हैं।
लटजीरा हैजा, गठिया, बवासीर,पथरी में, दांत के दर्द, ततैया आदि काटने पर विष दूर करने, भूख बढऩे पर कम में लाया जाता है। इसका अधिक प्रयोग करने से कुछ दोष नजर आते हैं जैसे आंखें लाल हो जाती है।
***होशियार सिंह, लेखक, कनीना**
अश्वगंधा
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विथानिया सोम्निफेरा
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अकसंड
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असगंध /विन्टरचेरी /इंडियन गिनसेंग
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अश्वगंधा
पौधा विथानिया सोम्निफेरा नाम से जाना जाता है जिसे कई अन्य नामों से भी
जाना जाता है जिनमें इंडियन जिनसेंग, पाइजन गूजबेरी, विंटर चेरी आदि प्रमुख
हैं। यह एक शाक के रूप में पाया जाता है। इसके अनेक प्रजातियां पाई जाती
है किंतु भारत में महज दो प्रजातियां मिलती हैं। यह एक औषधीय शाक है जिसका आयुर्वेद में बहुत अधिक उपयोग है। आम भाषा में अश्वगंधा कहते हैं। इसके फूल छोटे हरे एवं घंटी जैसे होते हैं।
अश्वगंधा दो शब्दों से मिलकर बना है अश्व अर्थात घोड़ा तथा गंधा का अर्थ
है महक। इसकी जड़ों में घोड़े जैसी बदबू आती है इसलिए इसे अश्वगंधा कहते
हैं। लेटिन भाषा में विथानिया का अर्थ नींद होता है। भारत के अतिरिक्त कई
देशों में से खेती के रूप में उगाया जाता है। इस पौधे में अनेकों रासायनिक
पदार्थ पाए जाते हैं। भारत के मध्य प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, गुजरात आदि
राज्यों में इसकी खेती की जाती है।
अश्वगंधा को शरीर के लिए बहुत
लाभप्रद माना जाता है। अश्वगंधा की जड़ों से अनेक प्रकार की दवाइयां बनाई
जाती है लेकिन अभी तक ऐसा कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है जो इसे बहुत
लभकारी या बहुत अधिक हानिकारक सिद्ध करता हो। अश्वगंधा मस्तिष्क के लिए
बहुत बेहतर माना जाता है क्योंकि इससे दिमाग तेज हो जाता है। यह तनाव कम
करने के लिए प्रयोग में लाया जाता है। इसमें एंटीआक्सीडेंट के गुण पाए जाते
हैं। बुढ़ापा रोकता है। शरीर की बीमारियों को कम कर देता
है। उसके प्रमुख लाभों में- यह खून में कोलस्ट्रोल को कम कर देता है।
इसलिए इसे उच्च रक्तचाप को कम करने के लिए काम में लेते हैं। यदि कोई
अनिद्रा से परेशान है तो वो इसका उपयोग कर सकता है। इससे गहरी नींद आती
है। अनिद्रा के शिकार होने पर इसका प्रयोग कर सकते हैं।
तनाव की बीमारी
से परेशान है वह व्यक्ति इसके प्रयोग से तनाव से बच सकता है क्योंकि इस
पौधे में निद्रा लाने वाला पदार्थ पाया जाता है। यौन क्षमता में भी
अश्वगंधा बहुत लाभप्रद हैं। कुछ व्यक्ति संतान सुख से वंचित रह जाते हैं
उनके पीछे उनके उनके शुक्राणुओं की संख्या कम होना माना जाता है। यह
पुरुषों में यौन क्षमता को बेहतर बनाना है तो इस अश्वगंधा का उपयोग
किया जा सकता है जिससे पुरुष तत्व की गुणवत्ता में सुधार आता है। वैसे भी
जब तनाव नहीं होता तो प्रजनन क्षमता बढ़ जाती है। कैंसर में यह रोग कारगर
है। अभी तक जो शोध हुए हैं उससे स्पष्ट है कि कैंसर रोग को रोकने में यह
कारगर है। जब कैंसर रोग में कीमोथेरेपी की जाती है तो उसके बुरे प्रभाव को
भी इससे में खत्म किया जा सकता है।
यदि
शुगर की बीमारी है तो शुगर की बीमारी को भी इसके जरिए रोका जा सकता है।
अभी तक कई प्रयोग जीव जंतुओं पर किए जा चुके हैं जिससे लगता है कि बहुत
बेहतर पदार्थ है जो शुगर की बीमारी दूर करता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता को
शरीर में बढ़ा देता है। इसे स्पष्ट है कि यह इम्यून शक्ति को बढ़ा देता
है। यदि गले में थायराइड ग्रंथि काम नहीं करती तो हार्मोन असंतुलित हो जाता
है। शरीर का वजन कम या अधिक हो जाता है। ऐसे में अश्वगंधा थायराइड ग्रंथि,
आंखों की बीमारियां जिनमें मोतियाबिंद प्रमुख इस अश्वगंध से दूर
किया जा सकता है। जोड़ों के दर्द, याददाश्त को सुधारना मांसपेशियों को
मजबूत बनाने में भी इसका योगदान है। यदि शरीर में संक्रमण क्षमता बढ़ जाती
है तो उस समय भी इसका उपयोग किया जाता है।
वजन घटाना हो या बुढ़ापे
को रोकना है या घाव भरने के लिए, त्वचा पर सूजन आने पर, यदि शरीर में
कोर्टिसोल नामक हार्मोन उत्पन्न नहीं होता हो तो





, बालों
में डैंड्रफ हो की समस्या, सफेद बाल पउ़ते हैं तो इसका उपयोग किया जाता
है। बाजार में यह कई रूपों में मिल जाता है चाहे चूर्ण हो या गोलियां हो या
पाक हो। इस अश्वगंधा में प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, लोहा, कैल्शियम,
कैरोटीन, विटामिन-सी आदि अनेक तत्व पाए जाते हैं। कुल मिलाकर अश्वगंधा से न
केवल पशुओं का इलाज किया जाता है अपितु मानव का इलाज भी किया जाता है। जो
पशु शक्तिहीन हो जाते हैं उन्हें यह शाक दी जाती है। असगंध के कारण पशु
बीमारी से खड़े हो जाते हैं और उनमें ताकत आ जाती है। अश्वगंधा बैल, भैंस,
गाय आदि को भी खुराक के रूप में दी जाती है। यह भैंस, बकरी आदि में भी
लाभकारी होता है। जहां उनकी दूध की क्षमता बढ़ती है वही या उन्हें शारीरिक शक्ति भी प्रदान करता है।
अश्वगंधा आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति महत्वपूर्ण पौधा है।
इसे नकदी फसल के रूप में उगाया जाता है। ताजा पति और जड़ों में घोड़े जैसी
और घोड़े के मूत्र जैसी गंध आती है। भारत में इसकी दो प्रजातियां पाई जाती
है। यह द्विबीजपत्री पौधा है जो सोलेनेसी कुल का सदस्य है। बैंगन जिस कुल
में आते हैं उसी कुल में यह पौधा शामिल किया गया है। अश्वगंधा की जड़े
शक्तिवर्धक, शुक्राणुवर्धक और पौष्टिक होती है। जोड़ों के दर्द,
खांसी अस्थमा दूर किया जाता है। महिला की बीमारियों जैसे श्वेत प्रदर, अधिक
रक्त स्राव, गर्भपात आदि में भी उपयोग किया जाता है। तंत्रिका तंत्र
संबंधी कमजोरी को दूर किया जाता है। आयुर्वेदिक दवाओं के निर्माण में इसका
महत्व है। गठिया, जोड़ों के दर्द, नपुंसकता को दूर करने के काम आता है।
इसकी जड़ों को त्वचा संबंधी बीमारियों को दूर की जा सकती है।
बाजार
में अवगंधा, अश्वगंधारिष्ट, अश्वगंधा घृत, चूर्ण अवलेह आदि रूपों में पाया
जाता है। अश्वगंधा का बलकारी, रसायन वाजीकरण, नाड़ी बलकार,धातुवर्धक नाम
से जाना जाता है ।सभी जड़ी बूटियों में से अश्वगंधा सबसे अधिक प्रसिद्ध
जड़ी बूटी है। पुराने समय से अश्वगंधा का उपयोग पशुओं के इलाज में होता रहा
है। अश्वगंधा की दवा चूर्ण, कैप्सूल सभी बाजार में उपलब्ध होते हैं।
**होशियार सिंह, लेखक, कनीना, महेंद्रगढ़, हरियाणा**
अश्वगंध
(वाइथनिया सोम्निफेरा)
भारत देश का प्रमुख पौधा
मिलता जंगल व उजाड़ में
यहां वहां खड़ा मिल जाता
या फिर खड़ा मिले बाड़ में,
आयुर्वेद का यह है उपहार
जन-जन करता इससे प्यार
गर्म, मादक, गंधयुक्त होता
इससे ही दवा बनती हजार,
गहरे हरे पत्ते मिले इस पर
आते फिर लाल-लाल फल
असगंध, शुक्रला कई नाम
निरास जन का अच्छा हल,
पशुओं के लिए दवा बनाते
ग्रामीण लोग इससे वाकिफ
वात, श्वास रोग दूर करता है
पक्षी, जंतु इसके हैं आशिक,
पत्ते, फल और जड़ काम के
कई उन्नत किस्में उगाई जाए
शुगर, हिचकी, टीबी दूर करे
जोड़ दर्द व कैंसर पर लगाए,
ध्यान भंग हो नींद नहीं आए
बीपी बढ़े और खून घट जाए
अश्वगंध हाजिर काम में लाए,
जड़ प्लेग रोग दूर कर देती है
थकान मिटा ऊर्जा शरीर पाए
हृदय रोग व श्वास रोग घटाए
यकृत ,गदूद, त्वचा रोग घटाए,
घाव पर रगड़ अश्वगंध लगाए
शुक्र घट जाए और बच्चा चाहे
या फिर शरीर में स्फूर्ति बढ़ावे
तो अश्वगंध को जरूर अजमाए,
अश्वगंध के पाक आरिष्ठ आसव
तीनों ही रूपों में मिलते बाजार
जोड़ दर्द, पीठ दर्द दूर करता है
रोग दूर करे अश्वगंध कई हजार,
जड़ में घोड़े जैसी ही बदबू आए
अत: यह पौधा अश्वगंध कहलाए
लाल फल रोचक मिलते हैं इतने
फलों को पशु पक्षी चाव से खाए।
***होशियार सिंह, लेखक, कनीना***



पत्थरचटा
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पत्थरचट्टा
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ब्रायोफिलम पिनेटम
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क्लांचो पिनेटम
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वायु संयंत्र/ कैथेड्रल घंटियां/ जीवन संयंत्र/ चमत्कार पत्ती/गोएथे
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यह एक पादप होता है जो पत्तों द्वारा ही जनक करता है। यह पथरी का रामबाण इलाज है। इसके पत्तों से नए पौधे पैदा होते हैं और गिरकर नए पौधे का रूप धारण कर लेते हैं। पत्थरचट्टा विभिन्न देशों में पाए जाते हैं। यह अकसर गमले में सजावट के लिए उगाया जाता है।
यह पौधा पत्तों में पानी इकट्ठा कर लेता है। इसके पत्ते चौड़े हरे दांतेदार सिर होते हैं। यह पौधा लाल गुलाबी रंग के फूल प्रदान करता है जो लंबी ट्यूब जैसे होते हैं। ब्रायोफिलम या पत्थरचट्टा हर जगह पाया जाता है। इसके अनेकों नाम है इसे अकसर पत्ती तोड़ कर गमले में डाल दिया जाता है और नया पौधा बन जाता है। बाजार में इसके कैप्सूल में मिलते हैं।
पत्थरचट्टा एक ऐसा पौधा होता है जिसमें जहरीले पदार्थ भी पाए जाते हैं जो हृदय को नुकसान पहुंचा सकते हैं किंतु गुर्दे की पथरी के लिए यह बेहतर माना जाता है। इसके पत्ते ही काम में लेते हैं, सिर दर्द में भी यह काम में लाया जाता है।
इस पौधे के जहां दो वानस्पतिक नाम होते हैं ब्रायोफिलम पिन्नाटम और क्लाचों पिनेटम जिसे सामान्य नामों से से जाना जाता है। इसे वायु संयंत्र/ कैथेड्रल घंटियां/ जीवन संयंत्र/ चमत्कार पत्ती और गोएथे आदि भी कहते हैं। यह मेडागास्कर के मूल पौधा है जो एक रसीला होता है। यह गर्मी को सहन करने की क्षमता रखता है तथा अपनी पत्तियों में पानी रखता है ताकि कम बारिश में भी आसानी से जी सके।यह एक विशेषता है जो इसके जीनस के कुछ अन्य सदस्यों के साथ आम है। कई लोग वर्तमान में इस पौधे को कलंचो पिन्नाटा भी कहते हैं।
ब्रोयोफिलम बारहमासी, रसीला, शाक होता है। प्राय एक मीटर तक बढ़ सकता है। इसके तने में पानी भरा होता है तथा लंबे एवं बेलनाकार के होते हैं। छोटा होता है तो प्राय लाल रंग का होता है बाद में हरे रंग को तथा पत्ते पूर्णरूप से हरे नहीं होते हैं।
इसकी पत्तियों स्रद्मह्य फीलोक्लाडेस कहा जाता है। वे मोटी, दांतेदार सिरे,पीले लाल रंग की होती हैं।
पोघे की दांतेदार पत्तियों में कलियां बनती हैं जो बाद में धरती पर गिरकर पौधा बन जाती हैं। इस आधार पर भी पौधे की अच्छी प्रकार से पहचान की जा सकती है।
पौधे के शीर्ष पर अनुकूल परिस्थितियों में लाल-नारंगी फूल लगते हैं। फूल नली के आकार के होते हैं। यह पौधा अति आक्रामक होता है जो एक बार कहीं पैदा हो जाये तो लगातार बढ़ता रहता है। लेखक गोएथे के नाम पर इस पौधे को गोएथे नाम से भी जाना जाता है। इस लेखक गोएथे को इस पौधे के प्रति गहन लगाव था और इस पौधे को उपहार के रूप में देता था।
कलन्चो पिन्नाटा को प्राय सजावटी पौधे के रूप में उगाया जाता है। गर्म क्षेत्रों में कलानचो पिन्नता को बगीचों में उगाया जाता है। अगर पशु इसे खा ले तो उनके हृदय में जहर पैदा कर सकता है। यह उच्च रक्तचाप के लिए उपचार के रूप में काम आता है।
पत्थरचटा के पत्तों के रस का उपयोग गुर्दे की पथरी के लिए भी किया जाता है। इसका उपयोग सिरदर्द को दूर करने भड़काव और कैंसर के से लडऩे के लिए प्रयोग करते हैं। बुखार में काम आता है। सिरदर्द के समय इसके पत्तों का रस नारियल तेल में मिलाकर माथे पर लगाते हैं।
पथरी के इलाज के साथ-साथ शरीर के विषाक्त पदार्थों को भी बाहर निकालता है। यह वात, पित्त और कफ रोगों में लाभप्रद है। पेट फूलने की समस्या, अल्सर घाव को ठीक करने में भी इसका योगदान होता है। पत्थरचट्टा गुर्दे की पथरी के लिए सबसे बेहतर माना जाता है। मूत्र विकारों में पत्थरचट्टा की पत्तियों का रस पिलाया जाता है। फोड़ों के इलाज में, उच्च रक्तचाप को कम करने के लिए उपयोगी है। पत्थरचट्टा सिर दर्द को दूर करता है, आंखों के लिए लाभप्रद है, घाव को ठीक करता है, खूनी दस्त बंद कर सकता है। इसलिए पत्थरचट्टा अधिक से अधिक ग्रामीण क्षेत्रों के लोग प्रयोग करते हैं। अक्सर ये 1 वर्ष तक जीता है तत्पश्चात इसके पत्तों से दूसरे पौधे बन जाते हैं और पुराने पौधे नष्ट हो जाते हैं, नए पौधे फिर से बड़े हो जाते हैं।
ब्रायोफिलम बहुत ही लाभप्रद पौधा माना जाता है। मेडागास्कर में यह समस्या बना हुआ है। वास्तव में यह कुछ देशों में सजावटी पौधे के रूप में काम में लाया जाता है। यह त्वचा की बीमारियां में भी काम आता है।
यह औषधीय जड़ी बूटी है जो चोट लगती है उपयोग किया जाता है, वही अल्सर के इलाज में भी काम लेते हैं। महिला प्रजनन प्रणाली की रक्षा करने के लिए भी यह काम आता है, कमर दर्द अक्सर एक समस्या होती है जिसके इलाज में इस पौधे की पत्ती, वहीं पत्ती घाव एलर्जी के काम आती है। माइग्रेन से पीडि़त है उसका इलाज भी पत्तों से किया जाता है। पत्ते गर्म किए जाते हैं ठंडे होने पर माथे पर रखे जाते हैं। यदि पैरों में दर्द होता है तो पत्थर चट के पानी में पैरों को कुछ देर भिगोते हैं। यदि धूप में काम किया है तो सनबर्न नाम से जाना जाता है, त्वचा पर कालिमा छा जाती है, इसका पेस्ट लगाया जाता है। घाव के और पीठ दर्द के इलाज वहीं कान नाक और गले के रोगों से लडऩे में भी कारगर है। शरीर पर झुरियां पड़ती तो तथा मांसपेशियों के खिंचाव में आराम देता है। वास्तव में के पत्ते बहुत कारगर होते हैं फिर भी इसका उपयोग गर्भावस्था के समय, हृदय की बीमारी वाले व्यक्तियों को नहीं करना चाहिये।
** होशियार सिंह, लेखक कनीना, महेंद्रगढ़ हरियाणा**

पत्थर चट
अफ्रीका की यह उत्पत्ति
पत्थर चट कहलाता सदा
ब्रायोफिलम जीनस इसका
गमलों में मिलता यदा कदा,
कम पानी में रह सकता यह
पत्तियों से जनन कर लेता है
पत्थर पर भी अगर उग जाए
पत्थरों पर जीवन पा लेता है,
अजीबोगरीब यह पौधा होता
कभी न हो इसका जीवन अंत
घरेलू रोगों का उपचार करता
ये अद्भुत नुसखे बतलाते संत,
घरों में खड़ा यह शोभा देता है
बीजों का कभी नहीं दे उपहार
इसके पत्तों का नित्य सेवन से
नहीं हो सके रोगों से कभी हार,
पत्थरी जब कभी गुर्दे में हो जाए
ब्रायोफिलम पत्तों का सेवन करते
खून संचरण, ब्लड शूगर रोगों में
मायरेक्ल लीफ प्लांंट याद करते,
पत्थर को जब यह चट कर जाए
शरीर की पत्थरी को नहीं छोड़ेगा
देखने में लगे यह सीधा सादा यह
प्रयोग से खून सदा नशों में दौड़ेगा,
सर्दी जुकाम लग जाए घर में जब
ब्रायोफिलम से किया जाए इलाज
कितने ही रोगों में काम आता यह
इसलिए दिलों पर सदा करता राज।
*****होशियार सिंह, लेखक, कनीना**
ग्वारपाठा
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घृत कुमारी
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ग्वारपाठा/घीकवाड़
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घृत
कुमारी/एलोवेरा,घिकवाड़ जिसे ग्वारपाठा के नाम से भी जाना जाता है। एक
औषधीय पौधे के रूप में विख्यात है। इसकी उत्पत्ति अफ्रीका में मानी जाती
है। इसकी प्रजातियां विभिन्न देशों में पाई जाती हैं। विभिन्न सभ्यताओं में
इसे औषधि के रूप में प्रयोग करते आ रहे हैं। इसका उल्लेख आयुर्वेद के
प्राचीन ग्रंथों में मिलता है।
घृत कुमारी के अर्क का प्रयोग बड़े स्तर
पर सौंदर्य प्रसाधन और वैकल्पिक औषधि उद्योग जैसे त्वचा को युवा रखने वाली
क्रीम, सुखदायक के रूप में प्रयोग किया जाता है।
यह माना जाता है कि
मधुमेह के इलाज में काफी उपयोगी हो सकता है। साथ ही यह मानव रक्त में लिपिड
का स्तर काफी घटा देता है। इसमें उपस्थित यौगिकों के कारण यह मधुमेह में
उपयोगी है। अब तो एड्स के रोगियों के लिए भी कैप्शूल तैयार किए गए हैं। यह
रक्त को शुद्ध भी करता है।
ग्वारपाठा के पौधे का तना नहीं होता या फिर
बहुत छोटा होता है। यह गूद्देदार एवं रसीला पौधा होता है। इसका फैलाव नीचे
से निकलती शाखाओं द्वारा होता है। इसकी पत्तियां भाले जैसी,
मोटी और मांसल होती हैं जिनका रंग, हरा, हरा-स्लेटी होने के साथ कुछ
किस्मों में पत्ती पर सफेद धब्बे एवं धारियां भी होते हैं। पत्ती के
किनारों पर की सफेद छोटे दांतों की एक पंक्ति होती है। गर्मी के मौसम में
पीले एवं नारंगी रंग के फूल उत्पन्न होते हैं।अब इसे पूरे विश्व में उगाया
जाता है। घृत कुमारी एक सजावटी पौधे के रूप में भी उगाया जाता है।
आजकल
घृत कुमारी की खेती एक बहुत बड़े स्तर पर एक सजावटी पौधे के रूप में की जा
रही है। अलोवेरा को इसके औषधीय गुणों के कारण उगा रहे हैं। यह रेतीले एवं
शुष्क क्षेत्रों में भी मिलता है। ग्वारपाठा किसानों में बहुत लोकप्रिय है।
घृत कुमारी हिमपात और पाले सहन नहीं कर पाता। परंतु यह कीटों का प्रतिरोध
करने में सक्षम होता है। इसे गमले में भी आसानी से उगाया जा सकता है। पौधों
के लिये बालुई मिट्टी जिसमें पानी का निकास अच्छा हो, धूप मिले वहां बेहतर
ढंग से पैदा होता है। छिद्रयुक्त गमले में बेहतर ढंग से पैदा होते हैं।
असर्दियों के दौरान घृत कुमारी सुषुप्त अवस्था में पहुंच जाती है और इस
दौरान इसे बहुत कम नमी की आवश्यकता होती है। सौंदर्य प्रसाधन उद्योग के
लिये अलोवेरा जैल की आपूर्ति के लिये घृत कुमारी का बड़े पैमाने पर कृषि
उत्पादन ऑस्ट्रेलिया, क्यूबा, डोमिनिक गणराज्य, भारत, जमैका, दक्षिण
अफ्रीका एवं अमरीका में भी होती है।
यावसायिक रूप में
उपलब्ध दही, पेय पदार्थों और कुछ मिऐलोवेरा सौन्दर्यवर्धक और उपचारात्मक प्रभावों के संबंध में वैज्ञानिक प्रमाण कम एवं विरोधाभासी हैं। घृत कुमारी का स्वाद
बहुत ही कड़वा होता है तथापि इसके जैल का प्रयोग व्ठाइयों में एक घटक के रूप में किया जाता
है। इसके बीजों से जैव इंधन प्राप्त किया जा सकता है। भेड़ के कृत्रिम
गर्भाधान में सीमन को पतला करने के लिये घृत कुमारी का प्रयोग होता है।
ताजा भोजन के संरक्षक के रूप में और छोटे खेतों में जल संरक्षण के उपयोग
में भी आता है।
एलोवेरा
शाकीय पौधा है जिसके पत्ते मोटे फूल जाते हैं जिनमें रस भरा होता है।
संजीवनी के नाम से भी संबोधित किया जा सकता है। उसकी करीब 400 प्रजातियां
पाई जाती है जिनमें से 5 प्रजातियां स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है। इसे
पौष्टिक भोजन के रूप में भी प्रयोग किया जाता है क्योंकि इसमें खनिज लवण, विटामिन आदि पाए जाते हैं। इसे प्रतिदिन सुबह प्रयोग किया जाए तो ताकत और स्फूर्ति प्रदान करता है।
बवासीर
आराम मधुमेह के लिए फायदेमंद, गर्भाशय के रोगों में लाभकारी, पेट से
संबंधित समस्या में रामबाण, जोड़ों के दर्द में आराम, कई तरह की समस्याओं
में जैसे कील मुंहासे, रूखी त्वचा, धूप से झुलसी त्वचा, चेहरे पर दाग,
आंखों के काले घेरे, फटी एडिय़ा आदि सभी में लाभप्रद होता है।
खून की
कमी को दूर करता है, जलने काटने पर एंटी बैक्टीरियल तथा एंटी फंगल का गुण
होता है। खून में शुगर नियंत्रित रखता है, मच्छरों को दूर भगाता है।
एलोवेरा जेल, बाडी लोशन, हेयर जैल, शैंपू, साबुन, फेशियल क्रीम आदि के
निर्माण में काम आता है। बालों को स्वच्छ बनाने के लिए जेल प्रयोग किया
जाता है। नारियल के तेल में मिलाकर कोहनी आदि पर लगाने से कालापन दूर हो
जाता है। मुल्तानी मिट्टी में मिलाकर कील मुंहासे दूर होते हैं।
यह
रक्तशोधक, पाचन क्रिया में लाभकारी होता है। नियमित एलोवेरा जूस पीने से
चेहरे और त्वचा में निखार आता है। बालों में लगाने से रूखापन एवं डैंड्रफ
दूर हो जाता है। खून की कमी को पूरा करता है वहीं उम्र भर स्वस्थ रखता है।
फेस वाश बनाने में, हल्दी मिलाकर सिर में लगाने से सिर दर्द दूर, पीलिया
दूर करता है वहीं गर्भावस्था में स्ट्रेस दूर करने में लाभप्रद है। वही
इससे मसाज करने पर त्वचा खींची दिखाई देती है।
आंवला
और जामुन के साथ एलोवेरा को प्रयोग करने से आंखों की दृष्टि बढ़ती है। सेव
करते समय कट हो जाए तो ऐलोवेरा लगाना लाभप्रद है। सूर्य की पराबैंगनी
किरणों से बचाता है, एंटी आक्सीडेंट के रूप में काम आता है।
सबसे बड़ी
बात है कि कोई पशु इसको नहीं खाता। इसलिए खेत में लगा देने पर खेत में पशु
नहीं घुसेंगे। इसलिए मेड का काम करेगा वही पशुओं को गर्मी में लाने के लिए
भी इसका उपयोग किया जाता है। किसानों की आमदनी बढ़ाने में इसका विशेष
योगदान है। एक बार उगाने पर तीन-चार सालों तक लगातार काम करता रहता है।
यह
लोहा कैल्शियम, मैग्नीशियम, विटामिन फोलिक एसिड से भरा होता ह। इसलिए
डायबिटीज, कैंसर बालों एवं त्वचा में लाभप्रद है। शरीर में रोग रोधक क्षमता
का विकास करता है। पाचन क्रिया को तेज करता है, मानसिक स्वास्थ्य रखता है,
गठिया में लाभप्रद है, कालस्ट्रोल को घटाता है, हृदय को स्वस्थ रखता है।
मधुमेह को रोकता है। स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद है। सर्दी जुकाम कब्ज में
बहुत लाभकारी है।
इससे फेस क्रीम बनाई जाती हैं जिससे मुंहासे दूर होते
हैं, झुर्रियां घटती हैं, बढ़ती उम्र रुकती है। धूप में जला हुआ व्यक्ति
इसका उपयोग कर सकता है।
इतना लाभप्रद होते हुए भी यह कभी-कभी नुकसान कर सकता है। जरूरत से ज्यादा प्रयोग करने से त्वचा जलन, खुजली, कम ब्लड प्रेशर











वाले अधिक प्रयोग करे तो नुकसान वहीं गर्भवती महिलाओं के लिए नुकसानदायक हो सकता है। पेट खराब की शिकायत कर सकता है।
**होशियार सिंह,लेखक,कनीना,महेंद्रगढ़, हरियाणा**
घृतकुमारी
(एलो वेरा)
आयुर्वेद की संजीवनी कहाए
ग्वारपाठा नाम से जाना जाए
400 जातियां इसकी मिलती
पांच ही उपयोगी जानी जाए,
मिली हुई है महाराजा उपाधि
पौधा जगत में अमर कहलाता
पूरे ही जग में यह पाया जाता
सैकड़ों रोगों में ये काम आता,
मुंह से लंबे समय तक मत लो
वरना हैजा,सिरदर्द,जी मचलाए
मुख इससे जाता है बहुत सूख
गुर्दे की प्रणाली खराब हो जाए,
गर्भवती को नहीं खाना चाहिए
महावारी, दुग्ध पान में न खाए
तना रहित यह पौधा कहलाता
फस्र्ट एड नाम से भी जाना जाए,
प्रसाधन के काम में उपयोगी
पत्ते इसके रस से भरे हुए होते
बुढ़ापा, शुगर, त्वचा के हो रोग
इसको ही लेकर रोगी ही सोते,
दमा, महिला जनन अंग रोगों में
कीट काटे, घमोरिया, घावों होते
जोड़ों का दर्द,पीलिया,त्वचा रोग
इसको खा, लगाकर मरीज सोते,
शरीर का अंग जब जल जाता है
घृतकुमारी बहुत ही काम आता
आवश्यक अमल, विटामिन मिले
एंटीसेप्टिक के रूप में काम आता,
विटामिन ए,सी, ई मिलती इसमें
कैल्शियम, पोटाशियम, पाया जाए
इसके खाने से खनिज मिलते कई
मैग्नेशियम , मैंगनीज भी पाए जाए,
बवासीर रोग हो या हो एक्सरे बर्न
त्वचा एलर्जी, फुट फंगस का रोग
सन बर्न हो या फिर जोड़ों का रोग
हर तरह से उपयोगी करो उपभोग,
खाली पड़ी जगह पर इसे लगाओ
मंदिर मस्जिद परिसर में लगाओ
जड़ी बूटियां लुप्त हो रही जग से
पुरानी औषधियों को आज बचाओ।
***होशियार सिंह, लेखक, कनीना***